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मधेश प्रदेश में निर्वाचन: यह आत्ममंथन का समय भी है ! : जयप्रकाश आनंद

जयप्रकाश आनन्द

जयप्रकाश आनंद, 28 फरवरी 026 । आंकड़े निर्मम होते हैं, निरपेक्ष होते हैं। वे भावनाओं को नहीं, बल्कि यथार्थ को दिखाते हैं। हर आंकड़ा बीते समय का कठोर मूल्यांकन करता है और भविष्य के लिए एक स्पष्ट दिशा भी देता है। मधेश प्रदेश के पिछले दशक को देखें तो यही कठोर यथार्थ हमारे सामने खड़ा नजर आता है—संभावनाओं से भरी उपजाऊ धरती पर विकास का चक्र घूम नहीं सका, बल्कि असफलताओं का चक्र ही बार-बार दोहराता रहा।

सन् 2015 के संविधान ने मधेश प्रदेश (पूर्व प्रदेश नं. 2) को जन्म दिया और 2017 से प्रदेश पूर्ण रूप से संचालन में आया। गठन के बाद अधिकांश समय मधेसी दलों—जनता समाजवादी पार्टी, लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी, जनमत पार्टी आदि—के नेतृत्व या निर्णायक भूमिका में सरकारें बनीं। लालबाबू राउत जैसे नेताओं ने लंबे समय तक मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली। तराई की उपजाऊ भूमि, उच्च जनसंख्या घनत्व, भारत से खुली सीमा और कृषि की अपार संभावनाओं के कारण जनता ने बड़े आर्थिक परिवर्तन की अपेक्षा की थी। लेकिन पिछले 10 वर्ष (2017–2025) के आंकड़ों ने जो कहानी दिखाई, वह आशाओं और संभावनाओं से काफी अलग है।

सन् 2024 तक प्रादेशिक योजना आयोग, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO), NDHS, NLSS और UNDP की रिपोर्टों ने मधेश प्रदेश को लगभग सभी सूचकांकों में पीछे दिखाया है। मानव विकास सूचकांक (HDI) 0.561—सबसे कम। राष्ट्रीय औसत 0.622, बागमती 0.652 और गण्डकी 0.641 है। 2018/19 में 0.421 से कुछ सुधार हुआ, पर अन्य प्रदेशों से दूरी और बढ़ती गई। साक्षरता दर मात्र 68.3%—सबसे कम। महिलाओं की साक्षरता 55–60% के बीच सीमित, यानी बड़ा लैंगिक अंतर अब भी कायम। बच्चों की साक्षरता दर भी राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है।

गरीबी के सूचकांक भी उतने ही कठोर हैं। बहुआयामी गरीबी 24.02%—दूसरे नंबर पर सबसे अधिक। 2018/19 में 47.9% से घटकर आधी जरूर हुई, पर राष्ट्रीय औसत 20% से अब भी ऊपर है। आर्थिक गरीबी 22.53% है। प्रति व्यक्ति आय 2024/25 में 932 अमेरिकी डॉलर—सबसे कम, जबकि राष्ट्रीय औसत लगभग 1,496 डॉलर है। 1,000 डॉलर का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो सका। आर्थिक वृद्धि औसतन केवल 2.5% रही, जबकि लक्ष्य 9% था। 2023/24 में 3.8% वृद्धि हुई, फिर भी प्रदेश चौथे स्थान पर ही रहा। GDP में 13.1% योगदान होने के बावजूद 35% से अधिक निर्भरता अब भी कृषि पर है और उद्योग क्षेत्र सुस्त बना हुआ है।

स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति भी उत्साहजनक नहीं है। शिशु मृत्यु दर, पाँच वर्ष से कम आयु की मृत्यु दर और महिलाओं में एनीमिया (52%)—सभी राष्ट्रीय औसत से अधिक हैं। किशोरियों में गर्भावस्था की दर भी उल्लेखनीय रूप से अधिक है। आधारभूत संरचना में सिंचाई की बड़ी संभावनाएँ होने के बावजूद भूजल दोहन और बाढ़ की समस्या बनी हुई है। सड़क घनत्व तुलनात्मक रूप से ठीक है, पर ग्रामीण सड़कें अब भी कच्ची हैं। बिजली की पहुँच 100% होने का दावा किया जाता है, लेकिन आपूर्ति और गुणवत्ता कमजोर है।

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इस बीच सबसे तीखा संकेत वैदेशिक रोजगार के आंकड़े देते हैं—हर वर्ष एक लाख से अधिक युवा प्रदेश से बाहर जा रहे हैं। मेरे मतदान क्षेत्र सप्तरी-1 के कुल लगभग एक लाख मतदाताओं के बराबर युवा हर साल मधेश प्रदेश से विदेश रोजगार के लिए जाते हैं। इसका सीधा अर्थ है—स्थानीय रोजगार, उद्योग और निवेश का गंभीर अभाव। “गौरव की परियोजनाओं” के नाम पर मंत्रियों द्वारा योजनाओं की बिक्री, तालाब-तलैया, विद्यालय, साइकिल वितरण, अस्पताल और सर्प प्रजनन जैसे कार्यक्रमों में अनियमितता और भ्रष्टाचार के आरोप लगे; अख्तियार ने मंत्रियों, सचिवों, स्थानीय निकाय प्रमुखों और ठेकेदारों के खिलाफ मामले दर्ज किए। कई वर्षों तक बजट खर्च दर 50–60% के आसपास सीमित रही। विकास कागजों में ज्यादा दिखा, जमीन पर कम।

तुलनात्मक रूप से देखें तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है। बागमती और गण्डकी प्रदेश ने HDI, शिक्षा, आय और आधारभूत संरचना में उल्लेखनीय प्रगति की। कर्णाली और सुदूरपश्चिम भौगोलिक रूप से पिछड़े हैं, लेकिन मधेश—उपजाऊ तराई—का उनके साथ ही निचले स्तर पर रहना नेतृत्व और प्राथमिकताओं की गंभीर विफलता को दर्शाता है। बीते 10 वर्षों में बहुआयामी गरीबी घटी है, HDI में लगभग 0.1 अंक सुधार हुआ है, लेकिन लक्ष्य का केवल एक-तिहाई ही हासिल हुआ। संभावनाओं के अनुपात में विकास लगभग शून्य जैसा दिखाई देता है।

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इसका मुख्य कारण राजनीतिक प्राथमिकताओं में दिखाई देता है। मधेसी दलों के नेतृत्व ने राजनीतिक स्थिरता और पहचान के मुद्दों को आगे बढ़ाया, आवाज उठाई—यह एक उपलब्धि है। लेकिन आर्थिक रूपांतरण, सुशासन और भ्रष्टाचार नियंत्रण में अपेक्षित परिणाम नहीं आए। विकास की जगह सत्ता की साझेदारी, ठेकेदारी और आपसी समझौते प्राथमिकता बन गए। परिणामस्वरूप गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य का अभाव, निवेश की कमी और युवाओं का पलायन—इन सबने मधेश को “अन्न का भंडार” से “गरीबी का भंडार” बनने की ओर धकेल दिया।

समग्र निष्कर्ष यही है—मधेश प्रदेश का यह दशक “कुछ आधारभूत प्रगति, पर बड़ी विफलता” का दशक रहा। संघीय व्यवस्था से जनता ने जो समृद्धि, रोजगार और सम्मानजनक जीवन की अपेक्षा की थी, वह अब भी अधूरी है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ा, लेकिन जनता के जीवन स्तर में अपेक्षित परिवर्तन नहीं आया। अब विकास की दूसरी यात्रा में यदि भ्रष्टाचार-मुक्त सुशासन, शिक्षा और स्वास्थ्य में बड़े निवेश, स्थानीय उद्योग और युवा रोजगार पर ध्यान नहीं दिया गया, तो मधेश के हमेशा “सबसे पीछे” रह जाने का खतरा बना रहेगा। इस विफलता की जिम्मेदारी केवल मधेसी दलों की ही नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की भी है। केंद्र को बजट, नीति, बड़े प्रोजेक्ट, निवेश और सुशासन का रास्ता खोलना चाहिए था—पर मधेश को कई बार केवल “वोट बैंक” की तरह देखा गया, विकास के साझेदार की तरह नहीं।

इन्हीं कठोर यथार्थों के बीच एक भावनात्मक प्रश्न उठता है—अब क्या करें?

मधेश प्रदेश नेपाल का अन्न भंडार है, विकास की आधारभूमि है, तराई का उर्वर हृदय है। लेकिन आंकड़ों की तस्वीर—HDI 0.561, साक्षरता 68.3%, बहुआयामी गरीबी 24%, प्रति व्यक्ति आय 932 डॉलर, लक्ष्य का केवल एक-तिहाई आर्थिक वृद्धि—हमें झकझोरने के लिए पर्याप्त है। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, आधारभूत संरचना—हर क्षेत्र में पिछड़ापन। युवा पलायन, भ्रष्टाचार, अधूरी परियोजनाएँ—यह असफलता का चक्र बार-बार क्यों दोहराया गया? कहाँ कमी रह गई? बड़े-बड़े नेता हैं। कभी लगता है जैसे भगवान कहीं कैलाश के नीचे ‘शम्बाला’ में हों, या दुनिया का एकमात्र ‘मसीहा’ मधेश में ही जन्मा हो! ‘नासा’ के अद्भुत वैज्ञानिक मानो अंतरिक्ष में ही व्यस्त हों, या उद्धारक नेता बनकर मधेश में ही घूम रहे हों! फिर भी यह दुर्दशा क्यों?

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मैं किसी दल के पक्ष में नहीं हूँ। मैं केवल एक मधेशी नागरिक की आवाज लेकर लिख रहा हूँ।

आगामी निर्वाचन (2082 फागुन 21) के प्रचार-प्रसार समाप्त होने के बाद, मतदान से एक रात पहले—कृपया अकेले बैठिए। मोबाइल बंद कर दीजिए। किसी नारे, किसी भाषण, किसी भावनात्मक अपील से ऊपर उठकर आंकड़ों के सामने खड़े होइए। खुद से पूछिए—हमने क्या पाया? हमारे बच्चों को क्या मिलेगा? निर्मम मूल्यांकन कीजिए। कोई कुछ भी कहे, कितने ही मीठे वादे करे, अपना मत प्रादेशिक विकास, राष्ट्रीय एकता और दीर्घकालीन शांति के लिए दीजिए।

उसे चुनिए जो मधेश को वोट बैंक नहीं, विकास का साझेदार बनाने की स्पष्ट प्रतिबद्धता रखता हो। जो केंद्र और प्रदेश के बीच समन्वय स्थापित करे, भ्रष्टाचार रोके, निवेश लाए और शिक्षा व स्वास्थ्य में क्रांतिकारी सुधार का मार्ग दिखाए—उसी को चुनिए।

यह मत केवल किसी व्यक्ति के पक्ष में नहीं है। यह मत मधेश के भविष्य का है। यह मत नेपाल की एकता का है। मधेश उठेगा तो नेपाल उठेगा; मधेश समृद्ध होगा तभी देश समृद्ध होगा। कल हमारे बच्चे पूछेंगे—“माँ-बाप, आपने हमें हमेशा वोट बैंक क्यों बनने दिया?”

उस प्रश्न का सही उत्तर देने के लिए हमें तैयार रहना होगा—सही मतदान से, सही निर्णय से, सही प्राथमिकताओं से। मधेश जागे, विकास के मार्ग पर आगे बढ़े और नेपाल एकजुट, अटूट तथा समृद्ध बने।

यही मेरी भावनात्मक अपेक्षा है—मधेश के हर मतदाता तक यह संदेश पहुँचे। अब परिणाम मांगने का समय आ गया है, केवल वादे सुनने का नहीं।
जय मधेश, जय नेपाल।

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