“भारत-नेपाल संबंधों का हिंदी भाषा और साहित्य पर प्रभाव” विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
सिद्धार्थनगर

राजनीतिक अस्थिरता या गतिरोध कभी-कभी प्रभाव डाल सकते हैं, परंतु दोनों देशों की मैत्री का आधार मानवीय संबंधों में निहित है, जो अटूट और अविच्छिन्न हैं, विशिष्ट अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व बेसिक शिक्षा मंत्री प्रोफेसर सतीश चंद्र द्विवेदी ने कहा कि नेपाल का विकास सदैव भारत की चिंतनधारा के केंद्र में रहा है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कला संकाय की अधिष्ठाता प्रोफेसर नीता यादव ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि भारत और नेपाल के संबंध सांस्कृतिक निरंतरता के प्रतीक हैं। साहित्य, लोकसंस्कृति और शैक्षिक संवाद इन संबंधों को गहराई प्रदान करते हैं। विश्वविद्यालयों का दायित्व है कि वे इन आयामों पर शोध को प्रोत्साहित करें।

हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं पूर्व अधिष्ठाता प्रोफेसर हरीशकुमार शर्मा ने स्वागत वक्तव्य देते हुए कहा कि भारत-नेपाल संबंधों की जड़ें लोकजीवन में रची-बसी हैं और साहित्य इन्हीं संबंधों का जीवंत दर्पण है।

विषय प्रस्तावना करते हुए संगोष्ठी के संयोजक एवं हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर सत्येंद्र कुमार दुबे ने यह स्पष्ट किया कि यह संगोष्ठी केवल औपचारिक अकादमिक आयोजन नहीं, बल्कि अपने भौगोलिक और सांस्कृतिक संदर्भ से जुड़ा हुआ एक जीवंत प्रयास है। इस अवसर पर कुलसचिव डॉ. अश्वनी कुमार एवं परीक्षा नियंत्रक दीनानाथ यादव सहित विश्वविद्यालय एवं अन्य महाविद्यालयों के शिक्षक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे। प्रथम दिवस दो तकनीकी सत्रों का आयोजन हुआ, जिसमें दो दर्जन से अधिक प्रतिभागियों ने विभिन्न विषयों पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. राम पाण्डेय ने की और मुख्य वक्ता डॉ. राणा प्रताप तिवारी रहे जबकि दूसरे सत्र के अध्यक्ष डॉ. विशाल गुप्ता तथा मुख्य वक्ता डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव रहे।
इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। संगोष्ठी ने भारत और नेपाल के सांस्कृतिक, भाषाई एवं साहित्यिक संबंधों की ऐतिहासिक गहराई और समकालीन प्रासंगिकता को व्यापक रूप से रेखांकित किया। समापन सत्र को संबोधित करते हुए बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी के हिंदी विभाग के पूर्वाचार्य एवं प्रतिष्ठित साहित्यकार प्रो. मुन्ना तिवारी ने कहा कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारत एवं नेपाल संबंधों पर इस प्रकार का आयोजन अत्यंत मूल्यवान और सार्थक है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों का जनजीवन साझा मानवीय मूल्यों पर आधारित है-परिवार जीवन, समाज जीवन, लोक जीवन और लोक चेतना दोनों राष्ट्रों को उन्नति और परस्पर संबंधों के विकास का सशक्त माध्यम प्रदान करते हैं। सीमाएँ भले ही राजनीतिक रूप से अलग करती हों, किंतु चेतना, जीवन-मूल्य और जीवन-पद्धति दोनों देशों में समान है। छठ पर्व और साझा दार्शनिक परंपराएँ इस सांस्कृतिक एकात्मता की सजीव मिसाल हैं। हिंदी और नेपाली भाषा के विकास-चरणों में भी समानता है, अतः भाषा और साहित्य का प्रभाव दोनों देशों के संबंधों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश शासन, लखनऊ के संयुक्त सचिव डॉ. विनोद कुमार द्विवेदी ने कहा कि भगवान राम और माता सीता भारत एवं नेपाल की साझा सांस्कृतिक विरासत के आधार स्तंभ हैं। उन्होंने महात्मा गौतम बुद्ध के जन्म और उनके करुणा एवं शांति-आधारित दर्शन को दोनों देशों के संबंधों का सशक्त सेतु बताया। उन्होंने कहा कि रामायण परंपरा और बौद्ध चिंतन भारत- नेपाल संबंधों को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करते हैं तथा दक्षिण एशिया में सांस्कृतिक समन्वय की दिशा दिखाते हैं। विशिष्ट अतिथि के रूप में शिवपुर दीनबंधु इंस्टिट्यूट कॉलेज, (हावड़ा), कोलकाता विश्वविद्यालय के डॉ. सत्य प्रकाश तिवारी ने कहा कि भारत और नेपाल मित्र राष्ट हैं, जिनके बीच सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक और साहित्यिक समानताएँ अत्यंत घनिष्ठ हैं। भाषाई आधार पर दोनों देश निकट हैं-भारत में नेपाली भाषा को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है तथा नेपाल में हिंदी भाषा व्यापक रूप से स्वीकार्य है। नेपाल के कई ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने हिंदी में कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं जिनमें रामदयाल राकेश, ऊषा ठाकुर ,श्वेता दीप्ति ,तुलसी भट्टाराई , सच्चिदानंद मिश्र इत्यादि महत्वपूर्ण नाम हैं। डॉ. कृष्णचंद्र मिश्र की पुस्तक नेपाल में हिंदी एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की तरह है।
डॉ . तिवारी ने महात्मा गौतम बुद्ध को भारत- नेपाल संबंधों का सांस्कृतिक एंबेसडर बताया और बौद्ध साहित्य की भूमिका को रेखांकित किया। जनकपुर से अयोध्या प्रतिवर्ष आने वाली प्रतीकात्मक बारात सांस्कृतिक एकात्मता का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने भारतेंदु हरिश्चंद्र और नेपाली कवि मोतीराम भट्ट, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और लक्ष्मी प्रसाद देवकोटा के साहित्य का उल्लेख करते हुए कहा कि इन साहित्यकारों ने दोनों देशों के बीच आत्मीयता को सुदृढ़ किया है। उन्होंने सीमावर्ती विद्यार्थियों और शोधार्थियों से भारत- नेपाल के विविध आयामों का तुलनात्मक अध्ययन करने का आह्वान किया तथा कहा कि हिंदी और नेपाली दोनों देवनागरी लिपि में होने के कारण एक-दूसरे को सीखना सरल है। प्रो. हरीश कुमार शर्मा ने कहा कि भारत – नेपाल संबंध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि आत्मिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। साहित्य इन संबंधों का संवाहक है और यह संगोष्ठी उसी जीवंत परंपरा का विस्तार है। आभार ज्ञापन कार्यक्रम संयोजक प्रो. सत्येंद्र कुमार दुबे ने किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. जय सिंह यादव तथा आख्या प्रस्तुतीकरण डॉ. रेनू त्रिपाठी ने किया। दूसरे दिन पूर्वाह्न में तृतीय एवं चतुर्थ तकनीकी सत्रों का आयोजन हुआ। तृतीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ बलजीत श्रीवास्तव ने की । श्यामलाल महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. सत्यप्रिय पांडेय ने दोनों देशों के रचनाकारों द्वारा लोक साहित्य के क्षेत्र में किए गए साहित्यिक प्रयासों का उल्लेख करते हुए भारत नेपाल संबंधों की मजबूती पर प्रकाश डाला।
संगोष्ठी के दूसरे दिन आयोजित सांस्कृतिक संध्या विशेष आकर्षण का केंद्र रही। कार्यक्रम संयोजक प्रो. सत्येंद्र कुमार दुबे के निर्देशन में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कालजयी रचना ‘राम की शक्ति पूजा’ का मंचन किया गया। सांस्कृतिक संध्या को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. कविता शाह ने कहा कि संगोष्ठियों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की परंपरा रही है, किंतु इस प्रकार विषयानुकूल प्रस्तुति अनुकरणीय एवं अद्भुत है। ‘राम की शक्ति पूजा’ का मंचन भारत-नेपाल संबंधों की सांस्कृतिक एकात्मता को जीवंत करता है-माता सीता का संबंध जनकपुर (नेपाल) से और भगवान राम का अयोध्या (भारत) से है। इस दृष्टि से यह मंचन संगोष्ठी के विषय की सार्थक अभिव्यक्ति और और दोनों देशों के सांस्कृतिक समन्वय को भी रेखांकित करता है।


