सत्तामुखी पत्रकारो ने अपना ईमान बेच दिया है और भरे चौराहे नंगे खड़े हैं
मुरलीमनोहर तिबारी (सिपु) बीरगंज ,२० अगस्त |
मधेश आंदोलित है। दमन जारी है। पुलिस ने लाठीचार्ज किया, फिर अश्रुगैस छोड़े। जान बचाकर एक चाय दुकान में छुपे। देखा नारद मुनि भी शरण लिए थे।
मैंने कहा – “नारद जी आप भी रिपोर्टिंग करने आएं है, खुद आने की क्या जरुरत थी, कोई कोरेस्पोंडेंट भेज देते”।
नारद जी – “कोई सही रिपोर्ट नहीं भेज रहा। इन्द्रराज और यमराज कन्फ्यूज है। यहाँ के पत्रकार दो खेमे में है। एक सत्ताधारी पक्ष में तो दूसरे यथार्थ का चित्रण में। दुर्भाग्य है की सत्ताधारी पक्ष में मधेशी भी लगे हैै”।
मैंने कहा – “पत्रकारिता समाज का दर्पण है और लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ है । हे महर्षी ! क्या आज पत्रकारिता ईमानदार है ? क्या पत्रकार अपना कर्तव्य ठीक से निभा रहे हैं ? क्या पत्रकारिता का स्तर ठीक है”?
वरिष्ठ पत्रकार नारद मुनि – “आज पत्रकारिता जमींदोज हो रही है। पहले पुलिस को वेश्या कहा जाता था, अब पत्रकार को भी उसी में रखा जा रहा है। भारत में जनरल वीके सिंह ने मीडिया को वेश्या कहा था। एक वेश्या का अपना ईमान होता है, वो अपना जिस्म बेच देती है लेकिन ईमान नहीं । सत्तामुखी पत्रकारो ने अपना ईमान बेच दिया है और भरे चौराहे नंगे खड़े हैं….नारायण-नारायण” ।
मैं -” नेपाल का मीडिया १८० देशों की मीडिया की लिस्ट मे १२०वें पर है, ऐसी हालत सत्तालोभी पत्रकारो के नाते हो रही है। सत्तामुखी पत्रकारो की संवेदनशील्ता भूकंप के दौरान देखी है, की किस तरह से लाली लिपिष्टिक लगा कर, मेकअप कर के रिपोर्टिंग की । उनके चेहरो से लगा ही नहीं की वो, इतनी बड़ी आपदाग्रस्त रिपोर्टिंग कर रही थी। इतनी ज्यादा सवेदनहीनता की, एक माँ से पूछा की, वो कैसा महसूस कर रही है। जिसका बेटा बहू और पोता भूकंप मे मारे गए। इन पत्रकारो ने लोगों के आह, कराह, पीड़ा तक को बेच दिया । जहाँ मधेश में लाशें गिर रही है, ये दलाल गिद्ध बनकर उसे नोच रहे है”।
नारद जी – “पुराने पत्रकार का आदर्श था – निडर, निष्पक्ष और तटस्थ रहो। उसकी तेजस्विता, ओजस्विता, उसका खरापन, दीनजन-पीड़ित-शोषित से उसकी आत्मीयता होती थी”।
मैं – “पत्रकार जनता मे से होता था, जनता के दु:ख-दर्द का दर्शक नहीं, भोक्ता था। जनता पर होनेवाले प्रहार पहले अपने ऊपर लेता था। अपना सिर फ़ुड़वाकर, हाथ तुड़वाकर जनसंघर्षो का समाचार लाता था। उस युग के पत्रकार टुटही साइकिल, फ़टा पजामा, कंधे पर झोला लिए राजभवन और सचिवालय जाकर किसी से मिल लेता था। न गेट पर जिरह होती थी, न मुखबिरी का डर था। वह पीर, बावर्ची, भिश्ती सब था। आज ये शाम होते ही मोबाइल बंद करके रेस्टुरेंट में गुलजार नजर आते है। इनके सारे खबर इंटरनेट से चुराए होते है। ना अध्यन, ना अनुभव, ना शोध, ना कोई खोजी जानकारी”।
नारद मुनि – “तब लोग पत्रकार की कलम की शक्ति से वाकिफ़ थे, उसकी शक्ल नहीं पहचानते थे। एक बड़े पत्रकार जिस दुकान पर बार-बार पान खाते थे। वहा उनका भी अखबार आता था। कोई न जानता था, की वे सम्पादक है। सम्पादक जब मरे तो हर अखबार में फ़ोटो छपी। पानवाला उस दिन माथा ठोंककर कह रहा था- हाय राम, ये तो वही हैं जो रोज पान खाते थे। पता नही चला, नहीं तो उनकी चरण धूलि लगता”।
अपनी वीणा ठीक करके फिर बोले -“अब अखबार के साथ कोई अपनी आत्मा को जोड़ना पसन्द नहीं करता। तब अखबार सम्पादक या पत्रकार के नाम से जाने जाते थे। पराड़कर वाला ‘आज’; तुषार बाबू वाला ‘पत्रिका’; डेसमेंड यंग वाला ‘पायनियर’; बालमुकुन्द गुप्त का ‘भारत मित्र’; रामाराव या एम.सी. का ‘हेराल्ड’; हयातुल्ला अंसारी वाला ‘कौमी आवाज’; किपलिंग- चर्चिल का ‘पायनियर’ । आज ये दलगत यूनियन में रहते है, कार्यकर्ता की तरह कार्य करते है, फिर ये तटस्थ कैसे रह सकते है। इनकी दलगत सोच इनके निष्पक्षता पर हावी होकर दलदल में पहुच गइ है। मैं अकेला देवता और दानव का पत्रकार था, मेरी निष्पक्षता पर कभी ऊँगली नहीं उठी”।
मैं – “पहले देवता- दानव लड़ते थे। अब सत्तालोभी पत्रकार ख़ुद ही लड़ते है, जुगराफ़िया पर लड़ते हैं, भूमि और मकानों पर कब्जा दिलवाते हैं, प्रोमोशन, तबादले और तैनाती कराते हैं। पुलिस से मुद्दा मिलाते है। वे सारे एजेंट और दलालों वाला काम करते है। बस पत्रकारिता नहीं करते और पत्रकार कहलाते है। ज़िला स्तर के पत्रकार ९०% ब्लॅकमेलर हो गए है । ५०० – १००० रुपये पे पत्रकार बिकते है । शरीफ़, भोले-भाले को ठगते है। तब टूटी साइकिल वाले सम्पादक की इज्जत थी, उसमें अपनौनि थी, परतीत थी। अब कार, कैमरा, पांचसितारा जिन्दगी का रूआब है, पर खौफ़ है। जनता की उससे दूरी है, चिढ़ है, नफ़रत है। तब अखबारनवीसी थी, अब मीडिया है। लाख प्रचार किया जाए लेकिन पुलिस और जनसेवक में फ़र्क है। मीडिया और अखबारनवीसी में फ़र्क है। मीडिया शब्द से व्यावसायिक बिचौलिया या दलाल जैसी गन्ध आती है। आमदनी बढ़ी है, बाजार बढ़ा है। लेकिन जिसे साख कहा जाता है वह घटी है”।
नारद जी – “पत्रकारो के प्रति लोगो की संवेदना कम हो रही है । अगर किसी पत्रकार की हत्या होती है तो इनके मगरमच्छ के आँसू गिरते हैं । चिल्ला-चिल्ला के चर्चा होती है । जैसे कौआ के मरने पर कौवे चिलाते है। मेरे संतान तो पत्रकार ही है, अगर पत्रकार मरेंगे तो पत्रकारीता मरेगी, यानि लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ टूट जाएगा और लोकतन्त्र भरभरा कर गिर जाएगा । इसे रोक सकते हैं तो केवल पत्रकार या जनता द्वारा बहिष्कार-प्रतिकार”।
नारद जी “नारायण-नारायण” बोलते बोलते रुआंसे हो गए और “नारहेम – नारहेम” बोलकर अंतर्ध्यान होगा|

