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कैसी है राजनीतिक चातुर्यता ?

 

काशीकान्त झा:अपनी सन्तति को भविष्य सुखमय हेतु अप्राकृतिक रूप से संकल्पित मानवों से ही सिर्फ सावधान नहीं रहना है, वरन् ऐसे तथाकथित शुभ्र व्यक्तियों से भी अधिक सतर्कता अपनाना आवश्यक है, जो खास समूह के स्वार्थपूर्ति के लिए प्राकृतिक सिद्धान्त विपरित क्रियाकलाप में निशा दिवा विकृति चिन्तन मनन से नेपाल के बहुजातीय, बहुभाषिक, बहुधार्मिक एवम् बहुसांस्कृतिक व्यक्तियों के अकथनीय संघर्ष द्वारा स्थापित संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रात्मक शासन प्रणाली को कमजोर बनाकर विखण्डनकारी शक्ति के लिए स्वर्णीय पनाह स्थल निर्माण योजना का सफल कार्यान्वयन हेतु देश के विभिन्न भागों में विनाशकारी रणक्षेत्र स्थापनार्थ विष वृक्ष के बीच बोने में अपनी निकृष्ट राजनीतिक चातुर्यता का परिचय देते हें । जिसकी सान्दर्भिकता उस समय पुष्टि होती है, जब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मधेश के स्थापित मुद्दे जो मधेश आन्दोलन पश्चात् प्रचण्डजी तथा माधवजी की उपस्थिति में अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया समक्ष तत्कालीन प्रधानमन्त्री गिरिजाबाबु एवं मधेश के नेता त्रेय बीच सम्पन्न समझौता को एक पूर्वमन्त्री अर्थहीन की संज्ञा देते हैं तो दूसरे एक व्यक्ति अपने को भावी प्रधानमन्त्री के रूप में प्रस्तुत करते हुए निर्माण क्रम में रहे संविधान में उस समझौता को समावेश करने के बजाय बिहार तथा यूपी को मधेश प्रदेश में समावेश कराने की अभिव्यक्ति देते हैं । जिससे एक तरफ उच्च राष्ट्रीयता की भावना से ओत–प्रोत मधेशियों को अपमानित होने की अनुभूति होती है तो दूसरी तरफ एक पारम्पारिक शुभचिन्तक पड़ोसी मित्र राष्ट्र की सार्वभौकिता तथा मर्यादा वा उपहास होता हुआ प्रतीत होता है ।
क्या ऐसी मनःस्थिति के सन्दर्भ में राजनीतिक क्षेत्र में संलग्न सम्पूर्ण प्रजातान्त्रिक व्यक्तित्व, शैक्षिक क्षेत्र में समर्पित विद्वानगण, राष्ट्रसेवक के रूप में कार्यरत निष्पक्ष कर्मचारी वर्ग, सञ्चार क्षेत्र में आवद्ध सञ्चारकर्मी गण, वाणिज्य व्यापर के माध्यम से राष्ट्र को समउन्नत बनाने के कार्य में व्यस्त महानुभाव लोग, विशुद्ध कृषि पेशा में संलग्न कृषक समुदाय तथा दैनिक श्रम द्वारा अपने परिवार के भरण–पोषण कार्य में तल्लीन अनन्त कर्मनिष्ठ श्रमिक वर्ग जो अपनी सामाजिक मर्यादा की रक्षा करते हुए देश की सम्पूर्ण जनता की समृद्धि के लिए राष्ट्र की वेदी पर अपने प्राणों को न्यौछार हेतु हमेशा तत्पर रहते है, भविष्य में संचार माध्यम से अपनी–अपनी भावना प्रस्फुटित नहीं करेंगे ?
इतना ही नहीं, ऐसी अभिव्यक्ति देने वाले आर्थिक रूप से स्वयम् सक्षम होते हुए भी विदेश के हॉस्पिटल में स्वास्थ्य उपचारार्थ सरकार से करोड़ों रूपये प्राप्त करते है, जबकि प्रत्येक वर्ष द्रव्य अभाव में उनके भी दीन–हीन वलहीन कुछ मतदाता अल्पआयु में ही स्वर्ग के रास्ते को अपनाने के लिए बाध्य होते हैं ।
ऐसे महानुभाव की आँखों के सामने ऐसी करुण स्थ्तिि भी उनके पाशाण हृदय को द्रवित करने में असफल रहती हुई प्रतीत होती है । स्वभाविक करुण–क्रन्दन प्रति असम्वेदनशील व्यक्ति असफल नेतृत्व प्रदायक के समूह की अगुवाई करने की चेष्टा में सतत् व्यस्त देखा गया है । यों तो एक माननीय के स्वास्थ्य उपचार का पूर्ण दायित्व सरकार का होना गौरव की बात है और ऐसी जिम्मेदारी उस राष्ट्र की गरिमा को तब और बढ़ाती है, जब उस देश की सारी जनता के स्वास्थ्य उपचार की सम्पूर्ण जिम्मेदारी सरकार के होने की व्यवस्था कानुन द्वारा निर्धारित रहती है ।
परन्तु २०४७ साल के संविधान निर्माण के वक्त से ही जनता के हित में स्पष्ट उल्लेख करने का प्रसंग उठने पर तथाकथित राष्ट्रवादी के रूप में प्रस्तुत राजनीतिक दल पार्टी हित से ऊपर उठकर निर्णय लेने में असमर्थ देखा गया है । लेकिन माननीय सांसद महानुभावों की सुविधा सन्दर्भ में प्रसंग उठने पर हर्षोल्लास के साथ ताली की गड़गड़ाहट से सर्वसम्मत निर्णय की जानकारी जनता को मिलती आ रही है । उन महानुभावों की ऐसी मनोदशा से जनता पूर्ण विज्ञ हो चुकी है । जनता को पुनः गलत रास्ते खोजने के वातावरण को निर्मुल करने का प्रयास आज प्रत्येक देश भक्त नेपाली के लिए अपरिहार्य हो चुका है । विशेष रूप से वौद्धिक स्तर के व्यक्तियों के लिए यह गम्भीर चिन्ता का विषय बना हुआ है ।
यों तो विक्रम् सम्वत् २०६४ साल में प्रथम बार तथा २०७१ साल में दूसरी बात संविधानसभा का निर्वाचन सम्पन्न हो चुका है । नये–पुराने ६०१ माननीय संविधानसभा को निरन्तरता देने के बाबजूद भी पार्टीगत संकीर्ण मनःस्थिति, राजनीतिक दांव–पेंचयुक्त अप्रजातान्त्रिक विचार, दूसरों पर शासन करने की पारम्परिक मनोवृत्ति, केन्द्रीकृत शासन व्यवस्था में विश्वस्त संस्कार तथा काठमांडू आधारित विकास प्रति आकृष्ट होने की प्रवल भावना के कारण वे लोग नेपाल का सर्वमान्य संघीयतायुक्त संविधान देने में असमर्थ हो रहे है ।
दूसरी तरफ कानून का पूर्ण अवलम्बन, दण्डहीनता का अन्त, जनकेन्द्रित एवं पारदर्शी सरकार, भ्रष्टाचाररहित समाज तथा विकास स्वतः गतिशील होने की महत्ता को समझने वाले दूरदर्शी व्यक्तियों की निर्वाचन में हार होना भी संवैधानिक अनिश्चितता का कारण बना हुआ है ।
संघीयता प्रजातान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्था को सबल, सक्षम बनाने का एक माध्यम भी है, जहाँ संविधान केन्द्र और प्राप्त के बीच के अधिकार को स्पष्ट ढंग से व्याख्या करता है । इस मूल मन्त्र के साथ सन् १९५९ के दशक में भाषा के आधार पर प्रान्त का विभाजन भारत में भी हुआ है । वहाँ की जनता के हृदय में राष्ट्रीयता की अथाह भावना विश्व विख्यात है । इसीलिए तमिल लोगों को तमिलनांडू, मलायम्–केरला, कन्ड–कर्णाटक, तेलुग–आन्ध्र, वंगाल–वंशाली, महाराष्ट्र–मराठी, गुजरात–गुजराती, पञ्जाव–पञ्जावी को दिया गया है । इस ज्वलन्त उदाहरण के साथ यदि झापा से कञ्चनपुर तक चुरे क्षेत्र सहित मधेश में ३–४ प्रदेश बनाने के उद्देश्य से दिया जाता है तो नेपाल राष्ट्र अवश्यमेव शक्तिशाली बनेगा । जन–जन में राष्ट्रीयता की भावना और दृढ़ होगी । लक्ष्मी, सरस्वती का निवास प्रत्येक नेपाली के घर–घर में होगा ।
वैसे तो अभी तक की संविधानसभा की अवधि में छठवां व्यक्ति प्रधान मन्त्री की कुर्सी पर विराजमान है । फिर भी संसद सातवें प्र. मन्त्री की तलाश में क्रियाशील नजर आता है । अतः प्रजातान्त्रिक सिद्धान्त, निष्ठा, विश्वस्त नेतृत्व, ओजस्वी गुण सम्पन्न, उदारमना, क्षमतावान, विद्वान तथा सर्वप्रिय व्यक्तित्व विगत के सम्पूर्ण समझौते को समावेश कर समानता की उच्च भावना साथ पहचान एवम् सम्मानपूर्वक सम्पूर्ण नेपाली नागरिक के जीवन पद्धति होने के लायक, काविल संविधान निर्माण प्रति दृढ इच्छाशक्ति साथ प्रतिवद्धता प्रदर्शति करनेवाले सुयोग्य मार्गदर्शक को सरकार का नेतृत्व सहमति संसद से मिलने की प्रतीक्षा में धैर्यता के साथ सम्पूर्ण नेपाली प्रतीक्षारत है

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