राष्ट्रवाद, मधेश, सुगौली संधि और बालेन विवाद : राकेश मिश्रा के तर्कों का विश्लेषण
हिमालिनी विशेष, काठमांडू, 2 जून ।
लेखक राकेश मिश्रा के कई लंबे स्टेटस का मूल उद्देश्य केवल बालेन शाह के विवादित बयान का बचाव करना नहीं है, बल्कि नेपाल में प्रचलित राष्ट्रवाद, मधेशी पहचान, सुगौली संधि और भारत-नेपाल सीमा विवाद की पूरी राजनीतिक कथा को चुनौती देना है। इसे कई स्तरों पर समझना होगा।
1. राष्ट्रवाद की स्थापित धारणाओं को चुनौती
लेखक का पहला तर्क यह है कि 2020 में लिम्पियाधुरा-लिपुलेक-कालापानी को नेपाल के नए नक्शे में शामिल करने और उसे संसद से पारित कराने का निर्णय भावनात्मक राष्ट्रवाद का परिणाम था, न कि ठोस ऐतिहासिक प्रमाणों का।
उनका कहना है कि तत्कालीन प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली ने राष्ट्रवादी माहौल बनाकर संसद को प्रभावित किया और जो लोग इसका विरोध कर रहे थे, जैसे कि सांसद , उन्हें राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी।
हालाँकि यह दृष्टिकोण नेपाल की मुख्यधारा की राजनीतिक सोच से अलग है। नेपाल सरकार और अधिकांश दलों का दावा है कि लिम्पियाधुरा क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से नेपाल का हिस्सा है और इसके समर्थन में कई दस्तावेज प्रस्तुत किए जाते रहे हैं।
2. बालेन विवाद और मधेशी पहचान
लेखक का दूसरा बड़ा तर्क यह है कि बालेन शाह के एक बयान को लेकर जिस प्रकार उन्हें “राष्ट्रघाती” साबित करने की कोशिश की जा रही है, वह अतिरंजित प्रतिक्रिया है।
यहाँ लेखक एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्न उठाते हैं—
नेपाल में भारत से जुड़े किसी भी मुद्दे पर मधेशी समुदाय को अक्सर संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
उनके अनुसार, यदि कोई पहाड़ी नेता भारत पर टिप्पणी करे तो उसे राष्ट्रवादी कहा जाता है, लेकिन यदि कोई मधेशी व्यक्ति वैसी ही बात कहे तो उस पर “भारतीय एजेन्ट” या “राष्ट्रघाती” होने का आरोप लगाया जाता है।
यह नेपाल की राजनीति में लंबे समय से मौजूद पहचान-आधारित तनाव की ओर संकेत करता है।
3. सुगौली संधि और मधेश का प्रश्न
लेख का सबसे विवादास्पद और बौद्धिक रूप से चुनौतीपूर्ण हिस्सा यही है।
लेखक का तर्क है कि नेपाल के राष्ट्रवादी राजनीतिक वर्ग सुगौली संधि का उपयोग केवल भारत से सीमा विवाद के संदर्भ में करते हैं, लेकिन उसी संधि के माध्यम से मधेश (तराई) नेपाल में कैसे शामिल हुआ, इस पर चर्चा नहीं करते।
ऐतिहासिक रूप से:
- 1816 की के बाद नेपाल ने विशाल भूभाग खोया।
- बाद में कुछ तराई क्षेत्र नेपाल को वापस मिले।
- 1860 में ब्रिटिश शासन ने “नयाँ मुलुक” के कुछ हिस्से नेपाल को लौटाए।
यह तथ्य ऐतिहासिक रूप से सही हैं।
लेकिन लेखक इससे आगे जाकर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यदि कालापानी-लिम्पियाधुरा विवादित है तो मधेश का दर्जा भी ऐतिहासिक रूप से विवादित माना जा सकता है।
यहीं से उनका तर्क मुख्यधारा इतिहासलेखन से अलग हो जाता है।
क्योंकि:
- मधेश आज नेपाल का संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य हिस्सा है।
- भारत ने भी कभी मधेश पर कोई क्षेत्रीय दावा नहीं किया।
- इसलिए इतिहास की जटिलता और वर्तमान संप्रभुता में अंतर करना आवश्यक है।
4. “जय मधेश” बनाम “जय महाकाली” का विमर्श
लेखक बालेन शाह पर यह टिप्पणी करते हैं कि केवल “जय महाकाली, आयो गोर्खाली” जैसे राष्ट्रवादी प्रतीकों को अपनाने से उनकी मधेशी पहचान समाप्त नहीं हो जाती।
यह कथन प्रतीकात्मक राजनीति की आलोचना है।
लेखक का आशय है कि नेपाल के कई मधेशी नेता सामाजिक स्वीकृति पाने के लिए मुख्यधारा पहाड़ी राष्ट्रवाद को अपनाते हैं, लेकिन संकट के समय उनकी मधेशी पहचान फिर भी प्रश्नों के घेरे में आ जाती है।
यह तर्क नेपाल के पहचान-राजनीति (identity politics) की गहरी समस्या की ओर संकेत करता है।
5. भारत-नेपाल सीमा विवाद पर लेखक की राय
लेखक तीन विकल्प बताते हैं:
(क) द्विपक्षीय वार्ता
उनके अनुसार यही एक व्यवहारिक समाधान है।
(ख) अंतरराष्ट्रीय न्यायालय
लेखक का दावा है कि नेपाल का पक्ष कमजोर है और उसे नुकसान हो सकता है।
यह उनका व्यक्तिगत राजनीतिक आकलन है, कोई स्थापित कानूनी निष्कर्ष नहीं।
(ग) सैन्य विकल्प
लेखक इसे अव्यावहारिक बताते हैं।
वास्तव में भी भारत और नेपाल दोनों सरकारें आधिकारिक रूप से वार्ता को ही समाधान मानती रही हैं।
6. लेख की सबसे बड़ी ताकत
यह लेख नेपाल के राष्ट्रवाद की “पवित्र” मानी जाने वाली धारणाओं पर प्रश्न उठाने का साहस करता है।
लेखक पूछता है:
- क्या राष्ट्रवाद केवल भावनाओं पर आधारित होना चाहिए?
- क्या इतिहास को चयनात्मक रूप से पढ़ा जा रहा है?
- क्या मधेशियों के साथ दोहरा व्यवहार होता है?
- क्या भारत-विरोध ही राष्ट्रवाद का प्रमाण है?
ये महत्वपूर्ण प्रश्न हैं और इन पर बहस होनी चाहिए।
7. लेख की सबसे बड़ी कमजोरी
लेख में कई स्थानों पर विश्लेषण और राजनीतिक मत (opinion) आपस में मिल जाते हैं।
विशेष रूप से:
- “नेपाल का दावा सिद्ध नहीं होता”
- “अंतरराष्ट्रीय अदालत में नेपाल की 0% संभावना है”
- “मधेश का दर्जा भी विवादित है”
जैसे दावे ठोस निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं, जबकि ये बहस योग्य राजनीतिक मत हैं।
इतिहास और अंतरराष्ट्रीय कानून में ऐसे प्रश्न शायद ही कभी इतने सरल या शत-प्रतिशत निश्चित होते हैं।
निष्कर्ष
राकेश मिश्रा का यह लेख मुख्यधारा नेपाली राष्ट्रवाद की आलोचना है। इसका केंद्रीय संदेश यह है कि नेपाल को भावनात्मक राष्ट्रवाद से बाहर निकलकर इतिहास, मधेशी पहचान और भारत-नेपाल संबंधों को अधिक यथार्थवादी दृष्टि से देखना चाहिए। लेकिन लेख के कई निष्कर्ष व्यक्तिगत राजनीतिक व्याख्या हैं, जिन्हें अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
दूसरे शब्दों में, यह लेख “राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रघात” की बहस से आगे बढ़कर “नेपाल की राष्ट्रीय पहचान आखिर बनी कैसे?” जैसे कठिन प्रश्न उठाता है। यही इसकी प्रासंगिकता भी है और विवाद का कारण भी।


