Fri. Aug 7th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

सुखी व सफल और सार्थक जीवन की अमूल्य कुंजी मन की प्रसन्नता है : बिमल सर्राफ

 

बिमल सर्राफ, रक्सौल पूर्वी चंपारण । आज का युग अभूतपूर्व सुविधाओं, तकनीकी प्रगति और भौतिक समृद्धि का युग है। इसके बावजूद यदि किसी चीज़ की सबसे अधिक कमी दिखाई देती है, तो वह है मन की प्रसन्नता। धन, पद, प्रतिष्ठा और वैभव प्राप्त करने के बाद भी अनेक लोग तनाव, चिंता, अवसाद और असंतोष से घिरे हुए हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने बाहरी उपलब्धियों को ही सुख का आधार मान लिया है, जबकि वास्तविक प्रसन्नता मन की अवस्था है, जिसे न खरीदा जा सकता है और न ही किसी से उधार लिया जा सकता है।
प्रसन्नता का पहला और सबसे महत्वपूर्ण आधार सकारात्मक दृष्टिकोण है। जीवन में सुख और दुःख, सफलता और असफलता, लाभ और हानि—ये सभी जीवन के स्वाभाविक पक्ष हैं। जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखता है और हर कठिनाई में सीख खोज लेता है, वही जीवन का सच्चा आनंद अनुभव करता है। सकारात्मक सोच व्यक्ति को निराशा से बाहर निकालकर नई ऊर्जा और उत्साह प्रदान करती है।

यह भी पढें   सरकार द्वारा कप्तानगंज घटना के पीडि़तों को राहत तथा क्षतिपूर्ति प्रदान करने का निर्णय

संतोष भी प्रसन्नता का मूल मंत्र है। इच्छाओं का विस्तार अनंत है। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी जन्म ले लेती है। इसलिए जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखकर उपलब्ध संसाधनों के प्रति कृतज्ञ रहता है, वही वास्तविक सुख का अनुभव करता है। संतोष का अर्थ प्रगति रोक देना नहीं, बल्कि उपलब्धियों के साथ आभार का भाव बनाए रखना है।

स्वस्थ शरीर प्रसन्न मन का आधार है। नियमित व्यायाम, योग, प्राणायाम, संतुलित आहार और पर्याप्त विश्राम न केवल शरीर को स्वस्थ रखते हैं, बल्कि मानसिक तनाव को भी कम करते हैं। स्वस्थ जीवनशैली व्यक्ति को उत्साह, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है।

अध्यात्म जीवन को भीतर से प्रकाशित करता है। प्रतिदिन कुछ समय ईश्वर का स्मरण, ध्यान, प्रार्थना और आत्मचिंतन में लगाने से मन शांत होता है तथा जीवन में धैर्य, विवेक और आत्मबल का विकास होता है। अध्यात्म हमें सिखाता है कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि अपने अंतर्मन की शांति में निहित है।

यह भी पढें   मैं अपनी जनता के बीच में जाना चाहती हूँ – शेख हसीना

प्रेम, अपनापन और मधुर व्यवहार भी प्रसन्न जीवन के आवश्यक स्तंभ हैं। परिवार, मित्रों और समाज के साथ सम्मानपूर्ण संबंध जीवन को अर्थपूर्ण बनाते हैं। क्षमा करना, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना और कटुता को त्याग देना मन को हल्का और आनंदित बनाता है।

सेवा और परोपकार से मिलने वाला आनंद सबसे श्रेष्ठ माना गया है। जब हम किसी पीड़ित की सहायता करते हैं, किसी निराश व्यक्ति में आशा जगाते हैं या समाज के हित में कोई कार्य करते हैं, तब हमें जो आत्मिक संतोष मिलता है, वही वास्तविक प्रसन्नता का अनुभव कराता है।

आज के समय में तुलना और प्रतिस्पर्धा ने भी मनुष्य की खुशियाँ छीन ली हैं। दूसरों के जीवन से अपनी तुलना करने के बजाय यदि हम स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास करें, तो ईर्ष्या के स्थान पर प्रेरणा का भाव विकसित होगा और जीवन अधिक सुखद बन जाएगा।

यह भी पढें   विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष में प्रा.डा. खड्ग केसी नियुक्त

सबसे बड़ी कला वर्तमान में जीने की है। बीते हुए कल का पश्चाताप और आने वाले कल की चिंता, दोनों ही आज की मुस्कान छीन लेते हैं। जो व्यक्ति प्रत्येक दिन को ईश्वर का उपहार मानकर प्रेम, उत्साह और कृतज्ञता के साथ जीता है, वही वास्तव में प्रसन्न जीवन का अधिकारी बनता है।

आइए, हम यह संकल्प लें कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, हम अपनी मुस्कान, सकारात्मक सोच, सेवा-भाव, संतोष और आध्यात्मिक चेतना को कभी नहीं छोड़ेंगे। क्योंकि प्रसन्न व्यक्ति केवल स्वयं ही सुखी नहीं रहता, बल्कि अपने परिवार, समाज और राष्ट्र में भी आशा, प्रेम और सकारात्मकता का प्रकाश फैलाता है। यही जीवन की सबसे बड़ी सफलता और सबसे सुंदर उपलब्धि है।

बिमल सर्राफ

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com