Wed. Jul 15th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

संविधान निर्विवाद हो सकता था, अगर उसमें सम्पूर्ण देशवासियों का सम्बोधन होता : श्वेता दीप्ति

 

सम्पादकीय
देश ने नए संविधान को पाया है । निःसन्देह यह एक अविस्मरणीय क्षण होता है, किसी भी देश के लिए जब उसका अपना संविधान होता है । गणतंत्र में जीने का तात्पर्य होता है, अपने मौलिक अधिकारों के साथ जीना । संविधान, एक ऐसा जीवित दस्तावेज है जिस पर देश और देश की जनता अभिमान करती है, उसमें अपने अधिकारों को सुरक्षित देखती है और उम्मीद से भरी निगाहें विकास की राह देखतीं हैं । बहुमत के द्वारा लाया गया संविधान निश्चय ही निर्विवाद हो सकता था, अगर उसमें सम्पूर्ण देशवासियों को सम्बोधन किया गया होता । मसौदे से लेकर संविधान जारी होने तक और आज भी, वर्षों से शोषित देश का एक पक्ष निरन्तर संघर्षरत है । उनके संघर्ष को कम आँक कर सरकार ने जो गलती की और उनकी माँगों को जिस तरह अनदेखा किया गया, आन्दोलन को दबाने के लिए सत्ता ने जो हिंसात्मक हथकण्डे अपनाए, उसी का परिणाम आज देश की सम्पूर्ण जनता भुगत रही है । सत्ता की अदूरदर्शिता ने राष्ट्र की गति को ही रोक दिया है । विचलन, विखण्डन, असंतोष और आक्रोश देश के एक पक्ष को, देश की धार से अलग कर रहा है । वस्तुस्थिति की गम्भीररता को शासक पक्ष आज भी समझने की कोशिश नहीं कर रहा है। राजस्व घाटे में है, आर्थिक स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है किन्तु राजकीय पक्ष ना जाने किस भ्रम में जी रहा है ।
आस्था और विश्वास का महीना है, सामने हिन्दुओं का महापर्व विजयादशमी, दीपावली, छठ दस्तक दे रहा है किन्तु, मन आशंकाओं से घिरा है । किन्तु उम्मीद है कि सत्य की विजय होगी और निराशा का अंधकार जो जन मानस पर छाया हुआ है, वह शीघ्र ही प्रकाशमान होगा, सूर्य की स्वर्णिम किरणों के साथ उदासी के बादल छटेंगे, इन्हीं शुभेच्छाओं के साथ हिमालिनी परिवार की ओर से अनेक–अनेक शुभकामनाएँ —
इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है ।
एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तों
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है ।
shwetasign

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *