Fri. Apr 3rd, 2020

हर घड़ी दर्द में पैबन्द लग जाते हैं

सम्पादकीय
सत्ता का खेल भी अजीब होता है । कभी तो जनता की उम्मीदों को जगाकर सत्ता तक पहुँचने की सीढ़ी नेता तैयार करते हैं और कभी उन्हीं उम्मीदों की कफन तैयार कर के सत्ता को अपने हक में बचाने की कोशिश करते हैं । संविधान, संघीयता, सीमांकन, पहचान, अधिकार, नागरिकता कल तक इन सारे शब्दों ने जनता के अन्दर जिस चाहत को जगाया था, जिसे पाने की उम्मीद वो पिछले आठ वर्षों से सरकार से करती आ रही थी, आज जब इन्हें यथार्थ में ढालने का वक्त आया तो देश की दशा ही बदल गई । विकास और नए नेपाल की परिकल्पना तो न जाने कहाँ हवा हो गई है । प्रकृति ने जो चोट दी थी वह प्रकृति की स्वाभाविक गति थी, क्योंकि पृथ्वी के गर्भ में हलचल होना अप्राकृतिक नहीं था । वह सदियों से होता आया है । किन्तु आज देश में जो हलचल है वह मानव निर्मित है । इसे रोका जा सकता था । कमोवेश यह सभी जानते थे कि अगर जनता की भावना का सम्मान नहीं किया गया तो स्थिति बिगड़ेगी । बावजूद इसके सत्ता ने एक अवैज्ञानिक प्रयोग कर डाला और उनके इस प्रयोग ने कितने प्राणों की आहूति ले ली और न जाने कब तक यह सिलसिला जारी रहेगा ।
देश की आधी से अधिक आबादी असंतोष की आग में जल रही है । घरों के चिराग बुझ रहे हैं । देश भौतिक और आर्थिक सम्पत्ति की क्षति को प्रति दिन झेल रहा है ।  किन्तु यह देश इतना अमीर है कि, इसकी तनिक भी परवाह सत्ता को नहीं है और हो भी क्यों ? दातृ निकायों की कमी तो है नहीं । कोई ना कोई हाथ पुनर्निमाण के लिए आगे बढ़ ही आएँगे । किन्तु, उनका क्या जिन्होंने अपने परिजनों को खोया ? घृणा, द्वेष, प्रतिशोध ये भावनाएँ कभी हितकर नहीं होती हैं और आज यही भावनाएँ दिल में घर कर रही हैं । मधेश का हर भूभाग त्रास में जी रहा है । सेना परिचालन और निषेधाज्ञा किसी समस्या का समाधान नहीं है । सरकार को जल्द से जल्द समस्याका समाधान कर देश को भय और त्रास की स्थिति से निकालना चाहिए —
अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिए जाते हैं
जिन्दगी क्या किसी मुफलिस की कबा है जिसमें
हर घड़ी दर्द के पैबन्द लगे जाते हैं । (फैज)shwetasign

Loading...

 
आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: