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दुर्गा, शक्ति की देवी है फिर उन्हें पशुओं की बलि क्यों ? – करुणा झा

 

करुणा झा, राजबिराज , १५ अक्टूबर |

फूलों के खिलने में, सूरज के उगने में, नदियों के प्रवाह में, बारिश की बुँदो को गिरने में घास पर ओस की बूँदों मे, पक्षियों के कलरव में, पशुओं की चौकड़ी भरने में सब मे जीवन है, सब प्रकृति द्वारा दिया गया वरदान है । सब में भगवान है ।

भगवान को किसी एक फोटो मुर्ति या मन्दिर में कैद नही किया जा सकता है । अगर कहीं भगवान हैं तो प्रकृति के हर घटनाओं में विधमान है । आजतक जितनी भी बड़ी से बड़ी हिंसा हुई है वो भगवान के नाम पर ही हुई है । मनुष्य जो भी कुछ करता है, उसकी आत्मा के गहनतम में यो पता तो रहता है कि ये गलत है या सही पर इसके बावजुद भी वह अपने आपको पाता है कि वह अपने मन की दमित हिंसा की भावनाओ से तथा अपने असंवेदनशील विचारों से उत्पन्न जघन्य कृत्यों से मुक्त होने में असमर्थ है, तब अपना कृत्य भगवान के उपर लाद देता है । और अपने आपको उन कृत्यों के उत्तरदायित्व से मुक्त कर लेता है ।

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धर्म, आस्था, ईश्वर के नाम पर सबसे बडी कुप्रथा का नाम है – पशुबलि अपने स्वार्थ सिद्धि के मतलब से कुछ अन्धविश्वासी या अन्धी आस्था में डूबे लोग आस्था या पूजा के नाम पर निरीह पशुओं की नृशंस बलि चढ़ा देते हैं । कालीपूजा को बली दी जाती ।

हमारे देश में दुर्गापूजा सबसे बड़ा त्योहार होता है । दुर्गा जो स्वयं आदि शक्ति हैं । राम जब रावण से युद्ध करना चाह रहे थे तो रावण की शक्ति से राम भयभीत थे, तो लंका पर चढ़ाई करने से पहले उन्होंने आदि शक्ति माता दुर्गा की आराधना की, तब उन्होंने लंका पर चढ़ाई कर रावण को हराया था और अपनी भार्या सीता को वापस, लाये थे उसी दिन से दशहरा मनाने की शुरुआत भी हुई और असत्य के उपर सत्य की हिंसा के पर अहिंसा की, पाप के ऊपर पुण्य की जीत हुई थी । तो दुर्गा जी जो स्वयं शक्ति की भंडार है, उनके सामने हम निरीह पशुओं को काटते है, अबला, असहाय प्राणी के उपर अपनी शक्ति प्रदर्शन करते हैं और ये सोचते हंै कि – दुर्गा या काली माँ बहुत प्रसन्न होगी । ऐसा विल्कुल नही हो सकता । सनातन धर्म में कभी बलि–प्रथा नही रहा, ये कुछ कर्मकाण्डो के माध्यम से शुरु हुआ । सब जीवों मे जब प्रभु का वास है तो ये कदापि नही हो सकता कि कोई भी भगवान किसी की हत्या से प्रसन्न हो – वैसे ही इस्लाम धर्म मे बकरीद के अवसर पर भी हजारों लाखों प्राणियों की कुर्बानी दी जाती है बकरीद (बकरी+ईद) में कुर्बानी देनी है तो अपने स्वाद की कुर्बानी दो । खुदा भी खुश हो कर जन्नत वख्सेगा । किसी भी धर्म मे किसी जीव की हत्या की सिफारिश नहीं करता अगर किसी जीव हत्या से कोई देवी देवता प्रसन्न होते हैं तो उन्हें देव न तो देवी देवता माना जा सकता है, न खुदा । धर्म सभी जीवों पर दया करना सिखाता है, सभी जीवों का प्रकृति पर समान अधिकार है, ये सिखाता है, प्रकृति का सन्तुलन बना रहता है । हमारा वेद–शास्त्र भी कहता है – “अहिंसा परमों धर्म” माँ दुर्गा आदि शक्ति, सर्व शक्तिमान है, उनके सामने हम किसी भी जीव की बलि दें ये उन्हे विल्कुल अच्छा नही लगेगा । फिर हमारे देश में वाइल्ड लाईफ प्रोटेक्शन, एक्ट भी है, पर वो कहाँ है ? कहाँ काम करता है, आजतक पता नही ?? पर हम ऐसा त्योहार न मनाएँ जिसमें किसी निरीह पशु पक्षी का खून बहे । पशु, पक्षी और जानवर हमारे प्रकृति के लिए और हमारे पर्यावरण सन्तुलन के लिए बहुत उपयोगी है । इस धर्मिक कुप्रथा का अन्त करें ।।

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