अरे भलेमानुष, हमारे प्रिय मधेशी नेतागण ! किसी एक के नेतृत्व तो स्वीकार करो
गंगेशकुमार मिश्र , कपिलबस्तु, १२ जनवरी |
” कलुषित मानसिकता के वशीभूत, नेपाली सत्ता के ठेकेदारों ने मधेश को जातीयता की आग में झोंक दिया है।”
” बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर;
पंक्षी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।”
इन्सान बड़ा तब होता है, जब अपने को छोटा बना के रखता है; सम्मान नहीं खोजता, वह दूसरों का सम्मान करता है। लेकर हमारे नेतागण किसी का सम्मान
करना ही नहीं जानते, केवल सम्मान चाहते हैं। जो चाहने से नहीं, त्याग से, सबको साथ लेकर चलने से मिलता है। बड़े दुःख की बात है, इतने दुःखों के बाद भी, उन दुःखों का अहसास हमारे नेताओं में नहीं दिख रहा। अहम् की टकराहट जस का तस है, हर कोई श्रेय लेने के पीछे पागल है।

जिस तरह से आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ा है, इससे तो यही लगता है; ये सुधरने वालों में से नहीं हैं। इन्हे समझाए कौन ? कोई नहीं समझा सकता। अब तो यही कहना पड़ेगा,” कैसे समझाऊँ, बड़े ना समझ हो।” कबतक ऐसे चलता रहेगा, कुछ तो सोचो; नहीं तो सब कुछ चला जाएगा हाथ मलते रह जाएगा ” मधेश “। संविधान के पक्ष में सभी पहाड़ीवादी पार्टियाँ एक मंच पर आ गईं और संविधान जारी हो गया। अब सोचने वाली बात यह है, क्या किसी और
मुद्दे पर, ये सभी पार्टियाँ फिर से एकजुट नहीं होंगी ? बिलकुल होंगी, देखते रहिएगा आप लोग। ये लोग जो चाहेंगे, जैसा चाहेंगे वही होगा; दो-चार रेवड़ियाँ मधेश की ओर भी फेंक देंगे और मधेश उसी में, खुश हो लेगा। आजतक यही तो करते आए हैं, ये लोग।
समानुपातिक सहभागिता के नाम पर मधेश को केवल ठगा गया, मधेश का बंदर- बाँट कर दिया; इन लोगो ने। जातीय विभाजन ऐसा किया कि पूछो मत, आदिवासी/जनजाति/महिला/मुस्लिम/
नेतृत्व को स्वीकार कर लो। छोड़ो दंभ, तोड़ दो; दासता की बेड़ियाँ।

