Wed. Aug 12th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

नाकाबन्दी की नौटंकी ! अभिमन्यु की तरह नही अर्जुन की तरह विजय हासिल करो : पंकज दास

 

पंकज दास, काठमाण्डू, 6 फरवरी ।

देर रात को आए भूकम्प के झटके से तो सिर्फ काठमांडू हिला था लेकिन दिन में बीरगंज नाका पर जो भूकम्प आया उससे ना सिर्फ मधेश आन्दोलन को झटका लगा है बल्कि उस भूकम्प से मधेशी मोर्चा, मोर्चा के शीर्ष नेता, काठमांडू का सिंहदरबार से बालुवाटार और यहां तक कि दिल्ली दरबार पर भी असर दिखाई दिया।

बीरगंज घटना को सभी लोग अपने अपने तरीके से विश्लेषण कर रहे हैं। मोर्चा में आबद्ध कई बडे नेता, मोर्चा से हमदर्दी रखने वाले कई बुद्धिजीवी लोग, आन्दोलन में सदभाव दिखाने वाले लोग काफी चिंतित दिखे। उन्हें लग रहा है कि बीरगंज नाका खुलने के साथ ही आन्दोलन खत्म हो गया। आन्दोलन धराशायी हो गया। अब क्या होगा? कैसे होगा? कौन करेगा?

पंकज दास
पंकज दास

अपने मन में किसी प्रकार की सोच बनाने से पहले कुछ सवालों का जबाब अवश्य ढूंढना चाहिए। जो लोग आज ऊंचे स्वर में क्रान्तिकारी भाषण झाड रहे हैं उन्हें दिल पर हाथ रख कर खुद से पूछना चाहिए

यह भी पढें   नहीं रहे राजेन्द्र विमल, साहित्य जगत ने एक महान विभूति को खो दिया

# मैंने आन्दोलन में कितनी इमानदारी दिखाई है?
# मैंने आन्दोलन में कितना समय खर्च किया है?
# मैंने पूरे आन्दोलन के दौरान मधेश में कितना समय बिताया है और काठमांडू में रहने का कितना बहाना ढूंढा हैं?
# आन्दोलन के लिए दिए गए जिम्मेवारी को कितनी इमानदारी से निभाया है?
# जिस नाकाबन्दी के लिए हायतौबा मचा रहे हैं उसमें मेरा कितना योगदान है?
# आन्दोलन खत्म करने के लिए, गलत समझौता करने के लिए मैंने कौन कौन सा प्रपंच रचा है?
# आन्दोलन में शहीद हुए कितने परिवार का हालचाल लेने पहुंचा?
# आन्दोलन में घायल हुए कितने लोगों को ढांढस बंधाया है?
# आन्दोलन छोड कर काठमांडू आने के लिए कितने तरह के बहाने बनाए हैं?
# अपने ही सहकर्मी के योगदान को नौटंकी, पब्लिसिटी स्टंट बताया है या नहीं?
# गलत समझौते के लिए दबाब बनाने हेतु कौन कौन सा हथकंडा अपनाया है?

और यदि यह सब किया है तो फेसबुक पर क्रान्तिकारी बनने और काठमांडू में रह कर नाकाबन्दी का ढोल पीटने की कोई जरूरत नहीं। अगर बीरगंज नाका खुलने से किसी के इज्जत पर धब्बा लगा है तो जाए और नाका पर बैठे।

यह भी पढें   देश के कुछ जिलों में बाढ़ का खतरा

सिर्फ बीरगंज नाका क्यूं बिराटनगर, भैरहवा और नेपालगंज भी बन्द हो। नाकाबन्दी के नाम पर सत्ता का बारगेनिंग करने लिए सिर्फ बीरगंज नाका को बन्द करना वहां की जनता को सिर्फ और सिर्फ दुख देना है। वहां के आन्दोलनकारियों को ठगना है। मोर्चा के नेता यदि वाकई में इमानदार हैं तो सभी नाका बन्द करे। या फिर बीरगंज नाकाबन्दी की नौटंकी बन्द करे।

कोई भी आन्दोलन जनता के समर्थन से जनता के सहयोग से जनता के लिए ही किया जाता है। जनता को दुख देकर, जनता को ठेस पहुंचाकर जनता की भावनाओं से खिलवाड कर के अपनी शेखी बघारने और शान झाडने के लिए सिर्फ एक ही नाकाबन्दी का कोई अर्थ नहीं। क्योंकि जनता प्रतिकार में उतरती है तो फिर अच्छे अच्छे आन्दोलन की हवा निकल जाती है।

जब मधेश की जनता पिछले ६ महीने आन्दोलन के मर्म और भावना को समझा है तो मोर्चा को भी अब जनता के दर्द को समझना होगा। यह संघर्ष अभी काफी लम्बा चलने वाला है। इसलिए उपयुक्त यही होगा कि बदली हुई परिस्थिति में संघर्ष का तरीका बदलें। आन्दोलन का स्वरूप परिवर्तन करना आन्दोलन खत्म करना नहीं होता है। और संगठित होने की आवश्यकता है। और सशक्त होने की आवश्यकता है। और शक्ति संचय की आवश्यकता है। युद्ध में जब चल रहे दांव सारे असफल दिखाई देने लगे तो अपनी चाल बदल देनी चाहिए। युद्ध विराम का मतलब युद्ध का अन्त नहीं होता बल्कि नए सिरे से नई शक्ति के साथ नई ऊर्जा के साथ युद्ध मैदान में उतरना ही अच्छे योद्धा की निशानी होती है। हमें अभिमन्यु की तरह नाकाबन्दी के चक्रव्यूह में नहीं फंसना है बल्कि अर्जुन की तरह अपने लक्ष्य से बिना भटके विजय श्री हासिल करना है। जय हो…..

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

You may missed

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com