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ओली सरकार को बचाने में चीन का हाथ : प्रशांत झा का बड़ा खुलासा

 

प्रशांत झा हिंदुस्तान टाइम्स में |११ मई

एक समय था जब नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली के सहयोगियों ने उनकी सरकार का तख्ता पलटने का आरोप भारत पर लगा रहे थे वहीं शीर्ष नेपाली राजनीतिक सूत्रों ने दावा किया है कि चीन ने ओली सरकार की निरंतरता सुनिश्चित करने में सक्रिय भूमिका निभाई है |

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 नेपाल के माओवादी नेता प्रचंड ने पिछले बुधवार को ओली के नेतृत्व वाली सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला किया था । लेकिन गुरुवार की सुबह उन्होंने अपना मन बदल लिया और ओली सरकार को ही निरंतरता देने का फैसला कर लिया |
इसके बारे में प्रचंड क्या बताते हैं ?
कई राजनीतिक सूत्रों द्वारा दावा किया गया है कि प्रचंड के यू-टर्न के पीछे चीनी “सलाह” ही है , लेकिन हिंदुस्तान टाइम्स के  एक विशेष साक्षात्कार में प्रचंड ने
अपने फैसले पर चीनी प्रभाव   से इनकार किया है और कहा कि  आंतरिक तैयारियों की कमी और जटिल स्थिति की वजह से पुनर्विचार किया था |

नेपाल के साथ चीनी सम्बन्ध में तेजी से वृद्धि हो ही रही थी इसबीच राजनीतिक नेताओं ने दावा किया है कि पहली बार बीजिंग ने घरेलू राजनीतिक स्थिति पर  एकाएक हस्तक्षेप किया है और वह सफल भी हुआ है ।

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पिछले कुछ सप्ताहों से सरकार में परिवर्तन की बातचीत चल ही रही थी कि चीनी राजनयिकों ने ओली का समर्थन करने के लिए अपना अभियान चला दियें । यह बात पार्टी के एक प्रमुख नेता ने बताई है | उनके अनुसार उन्होंने बताया कि  ” काठमांडू स्थित एक चीनी राजनयिक हमारे पास आया था और सरकार को समर्थन जारी रखने के लिए हमें कहा है, और कहा है कि नेपाल में स्थिरता के लिए यह अच्छा होगा।”
४ मई को प्रचंड ने उनके नेतृत्व में एक राष्ट्रीय सरकार होगी यह घोषित कर दिया था । नेकां ने प्रचंड का समर्थन किया था और मधेसी दलों ने भी समर्थन किया था । इससे ओली सरकार अल्पसंख्यक में पर गयी थी |

सूत्रों का कहना है कि इसीबीच काठमांडू में चीनी अधिकारियों ने माओवादी उपाध्यक्ष नारायण काजी श्रेष्ठ ‘प्रकाश’ और यूएमएल नेता बामदेब गौतम से बात की | और दो नेताओं ने ओली और प्रचंड के बीच मध्यस्थ के रूप में काम करना शुरू कर दिए |
एक और नेता के अनुसार उसी साम को दो चीनी राजनयिकों ने एक व्यापारी के घर जो ओली के करीब मने जाते हैं  प्रचंड से मुलाकात की । हालाकि प्रचंड इससे इनकार कररहे है |

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दुसरे दिन सुबह ११ बजे माओवादी नेता कृष्ण बहादुर महारा जिन्होंने प्रचंड को यूएमएल से समर्थन वापस लेने के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी – चीनी राजनयिकों के साथ मुलाकात की ।
महरा ने उनसे पूछा, “आपको क्या आपत्ति है, अगर  सरकार का नेतृत्व प्रचण्ड करते हैं तो ?” चीनी अधिकारियों ने कहा कि वे वर्तमान “वामपंथी सरकार” ही पसंद करेंगे | महरा ने यह भी कहा कि सरकार तो लेफ्ट के हाथ में ही रहेगी , राइट के हाथ तो नही जाएगी |
 एक और नेता  के अनुसार चीनी अधिकारी चाह्र रहे थे  कि अभी तुरन्त पारगमन और कनेक्टिविटी समझौतों पर हस्ताक्षर करने के बाद ओली बीजिंग से लौटे है । “बाहर संदेश  गलत जायेगा कि चीन के साथ एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर के कारण ही सरकार चली गयी ? उनका मानना था कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अक्टूबर में गोवा में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए अपने रास्ते पर काठमांडू का दौरा भी कर सकते हैं |

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अंत में ५ मई को रात में ओली और प्रचंड ने  एक सौदेवजी के तहत कि युद्ध के समय के मामलों में माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं किया जाएगा शामिल हस्ताक्षर किए ।  ओली संसद में बजट के बाद प्रचंड को सत्ता सौंपने पर सहमति व्यक्त की ।

भारतीय अधिकारियों का कहना है कि वे बारीकी से स्थिति का आकलन कर रहे हैं। “यदि यह सच है कि चीन इस तरह के एक भूमिका निभाई है, यह नेपाली राजनीति में हस्तक्षेपवाद का एक अभूतपूर्व स्तर निशान होगा,” एक स्रोत हिंदुस्तान टाइम्स को बताया।

source :  http://www.hindustantimes.com/india/the-chinese-advice-behind-prachanda-s-u-turn-on-support-to-nepal-govt/story-4sdNKxZxTu3QRMDdfcnjlN.html

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