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सत्ता के गलियारे में, एक बार फ़िर हड़कम्प मच गई है, उमड़ा है जनसैलाब

 

गंगेश मिश्र , कपिलबस्तु ,१६ मई |
यूँ तो इस बार, यह आन्दोलन राजधानी केन्द्रित है, सत्ता के सर पर है। सरकार बौखलाई हुई है, समझ नहीं पा रही इस बार; आन्दोलन को दबाएँ तो कैसे ? सरकारी महकमें के पेशानी पर बल पड़ने लगा है।जिस प्रकार सिंहदरबार को चारों तरफ़ से घेरा जा रहा है, सत्ता के गलियारे में एक बार फ़िर हड़कम्प मच गई है।
इस बार  आन्दोलन की धार सीधी है, ऊपर से नीचे की ओर; सत्ता के मूल द्वार से होती हुई: तराई के मैदानी भाग तक पहुँचेगी। मधेश की धरती, शहीदों के लहू से लाल धरती; अपने लालों के बलिदान का हिसाब लेगी।

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विगत आश्विन 3 गते संविधानसभा द्वारा जारी संविधान में, प्रदेश-सिमांकन सम्बन्धी विषय को लेकर असंतुष्ट मधेश केन्द्रित दलों ने नेपाल-भारत सीमा क्षेत्र में आन्दोलन किया था। जिस वज़ह से आम जन-जीवन अस्तव्यस्त हो गया था, यही कारण है कि इस बार का आन्दोलन राजधानी केन्द्रित किया जा रहा है।
तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी के महासचिव सर्वेन्द्रनाथ शुक्ल ने कहा, ” सत्ता के मद में चूर निरंकुश शासन ने, अधिकार के आन्दोलन को साम्प्रदायिक आन्दोलन दिखाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। उसी भ्रम को तोड़ने के लिए शान्तिपूर्ण तरीके से, सिंहदरबार केन्द्रित धरना-प्रदर्शन किया जा रहा है।”
हर वक़्त लच्छेदार बातों, वादों से लैश रहने वाले माननीय प्रधानमन्त्री ओली जी की झोली में; समस्या समाधान के लिए कोई बूटी है या नहीं, देखना अभी बाकी है।

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