वह मां थी !
लक्ष्मी रुपल
यूँ तो परिवार को एक साथ मिल-जुल कर रहते हुए कई वर्षहो गए थे। परन्तु बहू को अब सासू माँ बोझ लगने लगी थी। एक दिन सास चाय के बर्तन धो रही थी। उसके हाथ से फिसल कर एक कप गिर कर टूट गया। बहू दौडÞ कर आई- ‘अब क्या कर दिया – आप से तो एक भी काम ढंग से नहीं होता। खराब कर दिया न पूरा चाय का सेट ! आप जब तक रहेंगी … कुछ न कुछ तोडÞ-फोडÞ करती ही रहंेगी।’ बहू तो पहले से ही ऐसे किसी अवसर की तलाश में थी। उसने बृद्धा के दो-चार कपडÞे एक चुन्नी में बाँधे और बाँह से पकडÞ कर सास को घसीटती हर्ुइ बाहर ले गई और फिर धम्म से दरबाजा बन्द कर दिया। बेटा पथर्राई आँखों से सब कुछ देख कर भी चुप रहा। वृद्धा अपने घुटनों पर सिर टिकाए बहुत देर तक रोती रही। रात को पडÞोस का एक व्यक्ति आया और उसे वृद्धाश्रम में छोडÞ आया। यहाँ आकर वह खुश थी। उस का सारा समय धर्मर्-कर्म और दूसरों की सेवा में बीतने लगा। आश्रम के लोग भी उस का बहुत सम्मान करते थे।
दो वर्षबाद अखबार में उसने एक विज्ञापन देखा, जिसके अनुसार एक युवक के दोनों गर्ुर्दे खराब हो गए हैं और वह किसी भी दाता से एक गर्ुदा देने की पर््रार्थना करता है। बृद्धा ने उसकी सहायता करने का मन बना लिया और आश्रम वासियों के सहयोग से कुछ रुपये भी जमा कर लिए। वह निश्चित समय पर अस्पताल पहुँच गई। उसका एक गर्ुदा युवक के शरीर में प्रत्यारोपण कर दिया गया। कुछ स्वस्थ हो जाने पर युवक ने डाक्टर से कहा कि वह उस करुणामयी महिला के दर्शन करना चाहता है, जिसने उसे नयाँ जीवन दिया है। डाक्टर युवक को उस महिला के पास ले गया, जो अपना एक गर्ुदा देने के बाद अभी अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ कर रही थी। युवक का मुँह आर्श्चर्य से खुला रह गया। वह उसकी अपनी माँ थी। -लेखिकाः भारत के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार है) ±±±


