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मोर्चा निसंदेह भटक गया है : मुरलीमनोहर तिवारी

 

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मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु) बीरगंज , ७ अगस्त |

“आज खुश तो बहुत होंगे तुम” दिवार फिल्म का दृश्य याद आता है, शहीद यही सवाल मोर्चा से पूछ रहे है। ग़लत, ग़लत ही होता है, पर किसीकी एक  हद तब हो जाती है, जब गलत वाला आँखे तरेर के उल्टा सवाल करने लगे। मोर्चा के सत्ता समर्पण-मुद्दा बिसर्जन की सब जगह आलोचना हो रही है। अब मोर्चा भी ढीठ बनके उपहास कर रहा है ।

मोर्चा के बड़े नेता ने कहा, “घायलों के इलाज के पैसे देने का फ़ोन आ रहा था, शहीदों के परिवार को कुछ नही मिला, और जेलो में बंदी के परिजनों का लगातार फ़ोन आ रहा था, उनके खर्च और उनको जेल मुक्त कराने के लिए सरकार के साथ गए”। अब इस बेतुकी बात का क्या ज़बाब हो सकता है ? जो शहीद हुए उन्हें दस लाख की नहीँ, मधेश की कामना थी। आंदोलन में घायल होना, जेल जाना ही तो संघर्ष है, और इसी को छोड़कर जिससे संघर्ष करना है, उसी के पास घुटनें टेक दिए। इतना डर लग रहा था तो आंदोलन का स्वांग क्यों किया ?

मोर्चा के नेता सवाल करते है “क्या ओली को प्रधानमन्त्री से हटाने का वातावरण बनाना गलत था ?” हाँ गलत था, क्योकि ओली के नक्कली राष्ट्रवाद की पोल अब खुल रही थी, अब उन्हें अपने कुकृत्य का दण्ड मिलने वाला था। ओली को हटाकर, मोर्चा ने ओली को जीवनदान दे दिया, जो सर्वथा गलत हुआ।

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“नये बननेबाले प्रधानमन्त्री से आगे संवाद व सहमति के लिए न्यायपूर्ण शर्तों पर कबूलियत करबाना गलत है ?” हाँ, ये भी गलत है, क्योकि नई सरकार के पास दो तिहाई बहुमत नहीँ है, सारे सहमति कागज़ के टुकड़े तक सिमित रह जायेंगे।

“सब से पहले मधेश आन्दोलन के क्रम में शहादत प्राप्त करनेबाले अमर शहीदों को राज्य से औपचारिक रुप में शहीद घोषित करने का शर्त रखना गलत है ?” हाँ ये भी गलत है, क्योकि अमर शहीद किसी सरकारी ठप्पे के मोहताज नहीँ है। भगत सिंह तो आज तक भारत के सरकारी किताबो में आतंकवादी थे, क्या सरकारी मान्यता नहीँ मिलने तक उनके आदर-सम्मान में कोई कमी आई थी ?

“आन्दोलन के क्रम में घायल और अंगभंग हुए लोगों का इलाज की सुनिश्चितता की मांग गलत है ?” हाँ गलत है, आंदोलन मधेश ने किया और अपने घायल भाई-बंधू का इलाज कराने में मधेश स्वयं सक्षम है, हमे किसी से भीख लेने की मज़बूरी नही है। आंदोलन के घायलों की इतनी ही चिंता है, तो चुनाव लड़ने के लिए करोड़ो का इंतजाम कर लेने वाले, इनके लिए क्यों नहीँ किए। अगर इसका “स्पॉन्सर” नहीँ मिला तो, मधेश में डब्बा लेकर निकल जाते, पैसे रखने के जगह कम पड़ जाते।

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“जब तक सीमांकन, राष्ट्रियसभा सहित जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्त्व आदि ११ सूत्रीय मांगें तथा मुद्दों का सम्बोधन न होगा हम सरकार से दूर रहेंगे स्पष्टत: कह देना गलत है ?” हाँ ये भी गलत है, क्योकि आप ने ही उस संबिधान को नहीँ मानते हुए, जलाया, अब उसी के साथ सत्तापक्ष में बैठे है, ये गलत है। कहते है सरकार में नहीँ जाएंगे, पर ये सर्वविदित है, की मंत्री बनने के लिए मोर्चा के नेता, आधी रात तक प्रचण्ड निवास से चक्कर काट रहे है।

मोर्चा के प्रवक्ता कह रहे है, “बेकार में फेसबुकिया क्रन्तिकारी लोग हाय-तौबा मचा रहे है। वे अपने कार्यो का लेखा-जोखा करें। समाधान के लिए लचकता चाहिए। समझदारी चाहिए।आंदोलन समस्या का समाधान नही है।” आंदोलन आपने घोषणा किया था, आपके कारण इतनी जाने गई, इसलिए लेखा-जोखा आपका ही होगा। समाधन के लिए कितना लचकेंगे, लचकना ही था, तो ओली के पास ही लचक लेते, कितनी जानें बच जाती। क्या ओली, प्रचंड और देउबा में कोई अंतर है ? क्या कांग्रेस के सुशिल कोइराला सरकार में मधेशी की हत्या नही हुई ? क्या दोनों सरकार में माओवादी शामिल नही था ? क्या ओली सरकार में माओवादी का गृहमंत्री नहीँ था, जिसके आदेश पर सिर और छाती में गोलियां दागी गई ? आंदोलन समस्या का समाधान नही है, फिर आंदोलन किया ही क्यों ? अपने-अपने सांसदों के संख्या के आधार पर ही सहमति कर लेते, इतनी बलि क्यों चढ़वाई ?

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आंदोलन का एक लक्ष्य होता है, और लक्ष्य पूरा होने तक लड़ते रहना पड़ता है। आंदोलन शहीदों के सर गिनकर, या घायलों की संख्या देखकर नही की जाती। आंदोलन सफल होने तक अनवरत लड़ते रहना पड़ता है, इसमें पीढ़िया गुजर जाती है, लेकिन लक्ष्य से भटकने की इजाजत नही होती। मोर्चा निसंदेह भटक गया है, डर गया है, बिक गया है, परंतु प्रकृति किसी जगह को शून्य नही होने देती, मधेश अपने सही आंदोलनकारी को जरूर तैयार करेगा, तब तक धैर्य रखिए और इनकी गीदड़ भभकियों को देखते रहिए।
जय मधेश।।

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