महिला उत्पीड़न : विनोद कु. विश्वकर्मा
हांलांकि महिलाओं के लिए कड़े कानून हैं पर क्या वजह है कि यह प्रताड़ना नही रुक पा रही है ? वर्तमान परिपेक्ष्य में देश के तमाम राजनीतिक दलों के एजेण्डे से महिलाओं का सवाल सिरे से गया क्यों है ? क्या राजनीतिक पार्टी के लिए महिला मात्र वोट बैंक बनकर रह गयी है? इसके साथ ही यह भी चिंतन करने की जरुरत है कि महिला उत्पीड़न के अंतहीन मामले को कैसे राजनीतिक मुद्दा बनाया जाए ? देशभर में जारी महिला के विरुद्ध हिंसा की घटनाएं पुरुष प्रधान समाज की गैरबराबरी व प्रताड़ना की खौफनाक कहानी कहती है । एक तरफ जहां महिलाओं पर अत्याचार बढ़ रहे हैं वहीं दूसरी तरफ सत्ता के लालची इनके उपर हो रहे जुल्मों पर घडि़याली आंसू बहाकर नायक बनने की होड़ में हैं । यह तस्वीर बदलनी चाहि


