राष्ट्रवाद का नारा या विकास की राह ? क्या होगी प्रचण्ड नीति:डा. श्वेता दीप्ति
यही वो समय है, जब मधेश की जनता और मधेश की समस्या के समाधान के साथ अपनी पूर्व पहचान और विश्वास को मधेशी जनता के दिलों में कायम कर सकते हैं । वैसे यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री ने जिस कट्टर राष्ट्रवाद की जड़ को सींचा है, उसने देश के दो समुदायों को आमने सामने खड़ा कर दिया है ।
पिछले समय के घटनाचक्र को देखते हुए नेपाल की राजनीति में कमल का खिलना तो लगभग तय हो चुका था । कई महीनों की रस्साकसी के बाद अंततः नेपाल ने अपने उन्चालीसवें प्रधानमंत्री को पा ही लिया । अब ये कीचड़ में कमल की भाँति अपना अस्तित्व बनाए रखेंगे या प्रचण्ड उग्रता अपना कर पिछली गलतियों को दुहराएँगे यह उनका कार्यकाल बताएगा । वैसे जनता उम्मीद कर रही है कि एक नई धार के साथ
कल की चुनौती आज भी कायम
जो चुनौतियाँ पूर्व प्रधानमंत्री ओली के समक्ष थीं आज भी वो पूर्ववत हैं । उन्होंने तो अपने मुहावरों, कटाक्षों और हसीन सपनों को परोस कर नौ महीने काट लिए । किन्तु जनता अब उन सबसे बाहर आना चाहती है । अपने कार्यकाल में प्रधानमंत्री प्रचण्ड के सामने जो सबसे अहम चुनौती है, वो है प्रत्येक नेपाली, खासकर मधेशी, जनजाति, मुस्लिम और थारुओं के अन्दर इस भावना को जगाना कि नेपाल सबका है और सभी इस देश में समान हक रखते हैं । राष्ट्रवादिता किसी एक की विरासत नहीं है बल्कि, यह साझी भावना है और इसे किसी कसौटी पर परखने की आवश्यकता नहीं है । किसी के रंग–रूप, बोली और पहनावे से राष्ट्रीयता नहीं तय होती है बल्कि एकरूपता और संतोष की भावना ही देश के हर नागरिक को सद्भाव और भाईचारे से जोड़ती है वहाँ राष्ट्रीयता भी खुद–ब–खुद दिलों में घर कर जाती है । ये आन्तरिक मामला है, जिसे
आखिर क्यों जरुरी था सत्ता परिवर्तन ?
एमाले को साथ देने वाले माओवादी और काँग्रेस दोनों को जल्दी ही यह समझ में आ गया कि एमाले जिस राह पर चल रही है वहाँ सिर्फ बाते हैं, दमन है और तानाशाही की सोच है । जिसमें उनकी पार्टी का अस्तित्व सिर्फ खिलौना बन कर रह जाएगा और फिर जनता के सामने वो दुबारा मजबूती के साथ अपनी स्थिति को स्थापित नहीं कर पाएँगे । एमाले अपनी कूटनीति और विदेश नीति में पूरी तरह नाकाम रही । चीन ने एमाले का साथ दिया अवश्य, पर यह साथ नेपाल की नैया को किनारे तक नहीं पहुँचा सकती थी क्योंकि कई अड़चनें सामने हैं जिसका निदान तत्काल नहीं हो सकता है । एमाले सरकार चाहे कितने भी दावे कर लें चीन से हुए समझौते को लेकर, पर उसका कार्यान्वयन हाल के समय और परिस्थिति में सम्भव नहीं है । नेता और जनता चाहे कितनी भी स्वाभिमान की बातें कर लें पर यह बातें वहीं टिकती हैं, जहाँ सक्षमता साथ होती है । बातें कड़वीं अवश्य हैं, जो सुनना गँवारा ना हो पर यह कटु सत्य है । आज तक किसी भी पार्टी ने ऐसी नीति नहीं बनाई जिसका फायदा देश को मिले । अगर सोच में ईमानदारी होगी तो कोई भी तीसरा पक्ष आपको आपके निर्णय से डिगा नहीं सकता, बशर्ते सबको साथ लेकर चलने की कला आनी चाहिए । वत्र्तमान सरकार से यह अपेक्षा की जा रही है कि, वो वत्र्तमान समय में अपनी परिपक्वता का परिचय दे और देश को एक नई सोच और दिशा दे । जिसके तहत देश का हर नागरिक सुकून महसूस करे । वत्र्तमान सरकार एक इतिहास रच सकती है । नेपाल की राजनीति में यह पहली बार हुआ है जब माओवादी ने संसद के सबसे बड़े दल कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया है । इसे स्थायित्व प्रदान करना भी प्रचण्ड के लिए एक चुनौती ही है । अगर इस गठबन्धन को स्थायित्व मिला तो यह नेपाल की राजनीति में एक लम्बी पारी खेलने में सक्षम होगी । वैसे तो वत्र्तमान सरकार की कार्यावधि पहले से ही तय हो चुकी है । किन्तु इस नौ महीने में ही स्थानीय तह के निर्वाचन की बात चल रही है । दो दशकों से स्थानीय तह का निर्वाचन नहीं हुआ है ऐसे में इस कार्य को पूर्ण करना भी एक बड़ी चुनौती है । यह कार्य भी तब तक सम्भव नहीं है, जब तक तराई मधेश के असंतुष्ट पक्ष को सम्बोधन नहीं किया जाएगा ।
कैसी होगी आगे की नीति ?
हवा को शह देकर चीन के अनुकूल वातावरण तैयार करने में एमाले सरकार लग गई । चीन का नशा उनके सर कुछ ऐसा चढ़कर बोल रहा था कि वो ये भूल गए थे कि जिस पद पर वो आसीन हैं वहाँ कोरी बातें नहीं बल्कि हकीकत का कार्यान्वयन आवश्यक है । ऐसा माहोल तैयार हुआ कि लग रहा था अब नेपाल की सारी समस्याओं का निदान चीन के पास है ।
चाहे अनचाहे हर बार की तरह सत्ता परिवत्र्तन का सेहरा एक बार फिर भारत के माथे पर ही बँधा है । संविधान निर्माण और उसके लागू होने के बीच में भारत के साथ रिश्तों में जो कड़वाहट आई, सत्ता परिवत्र्तन के साथ ओली सरकार के कार्यकाल ने इसे और भी पोषित किया । रोज एक भड़काउ वक्तव्य देकर ओली सत्ता में बने रहना चाहते थे, यही उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई । नेपाल के साथ चीन की बढ़ती घनिष्ठता भारत के लिए सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से चिन्ता का विषय हमेशा से रहा है क्योंकि, चीन का पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध भी जग जाहिर है । ऐसे में भारत का अपनी सुरक्षा के प्रति सजग होना लाजिमी ही है । मधेश आन्दोलन को अप्रत्यक्ष रूप से भारत ने साथ दिया इसमें कोई शक नहीं है क्योंकि भारत यह जानता है कि भारत की शांति के लिए मधेश में शांति आवश्यक है । अगर मधेश अशांत हुआ तो इसका असर सीमावर्ती राज्यों और शहरों पर पड़ेगा । यही कारण था कि भारत ने बार–बार कहा कि नेपाल को सबको ले कर चलने की आवश्यकता है । भारत की यही सलाह एक बहुत बड़ी वजह बन गई नेपाल में भारत विरोधी हवा बहने में । इस हवा को शह देकर चीन के अनुकूल वातावरण तैयार करने में एमाले सरकार लग गई । चीन का नशा उनके सर कुछ ऐसा चढ़कर बोल रहा था कि वो ये भूल गए थे कि जिस पद पर वो आसीन हैं वहाँ कोरी बातें नहीं बल्कि हकीकत का कार्यान्वयन आवश्यक है । ऐसा माहोल तैयार हुआ कि लग रहा था अब नेपाल की सारी समस्याओं का निदान चीन के पास है । जबकि भौतिक रूप से देखा जाय तो नेपाल इस स्थिति में ही नहीं है कि, वो भारत के अस्तित्व को पूरी तरह नकार कर चीन को लेकर विकासोन्मुख हो सके । विकास की माँग समझदारी खोजती है, बेतुकी बातों का पिटारा नहीं । नए नेतृत्व से यह उम्मीद की जा रही है कि नेपाल भारत के सम्बन्धों में जो तिक्तता आइ है वो उसे दूर करेंगे । किन्तु इस सबके बीच प्रचण्ड के सामने दूसरा सबसे अहम सवाल या फिर चुनौती यह है कि वो भारत और चीन इन दोनों को साथ लेकर कैसे चलेंगे ? एमाले की नीति एक को चिढ़ाकर दूसरे को साथ लेकर चलने की थी जबकि यह नीति किसी भी ऐसे देश के हित में नहीं है, जो फिलहाल गणतंत्र की राह पर चलना सीख रहा है । नेपाल के लिए अगर सबसे बड़ी आवश्यकता कुछ है तो वो यह कि, देश को कैसे विकासोन्मुख बनाया जाय और इसके लिए कौन सी राह सहज और सरल है, इसका निर्धारण करना । चीन के साथ की जितनी आवश्यकता है नेपाल को उससे कहीं ज्यादा आवश्यकता भारत के साथ की है क्योंकि नेपाल की भौगोलिक संरचना ऐसी है जहाँ हर दृष्टिकोण से वह भारत के करीब है और इसको नकारा भी नहीं जा सकता है । प्रचण्ड के अवतरण से भारत में भी एक उम्मीद जगी है कि कूटनीतिक दृष्टि से जो रिश्ते बिगड़े हैं उनमें सुधार अवश्य होगा ।
मधेशी मोर्चा से अपेक्षा
मधेशी नेताओं को साथ लेकर चलने की कोशिश जारी है । वैसे तो तीन सूत्रीय समझौते के बाद मधेशी मोर्चा उत्साहित नजर आ रहा है । तमलोपा अध्यक्ष महंथ ठाकुर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अगर बातें और परिस्थिति अनुकूल हुई तो सत्ता में सहभागी होने से परहेज नहीं होगा । उन्होंने चेतावनी भी दी है कि आन्दोलन रुका नहीं है यह जारी है और अगर वत्र्तमान सरकार ने भी गम्भीरता से समस्या को सुलझाने की पहल नहीं की तो आगे के रास्ते खुले हुए हैं । वैसे बुद्धिजीवियों का मानना है कि मधेशी गठबन्धन को सत्ता में सहभागी नहीं होना चाहिए बल्कि बाहर से दवाब देना चाहिए । मधेश की जनता मधेशी नेताओं से सिर्फ मधेश हक की अपेक्षा कर रही है । इस भावना का खयाल नेताओं को करना ही होगा । किन्तु यह भी सच है कि हर समस्या का समाधान संसद से ही सम्भव है और इसके लिए समुचित कदम उठाने की आवश्यकता भी है । परन्तु मधेशी नेताओं की विगत की गलतियों की वजह से मधेशी जनता शंकित है और आश्वस्त नहीं हो पा रही है ।
संविधान का कार्यान्वयन
संविधान का संक्रमणकालीन समय चल रहा है । संविधान के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक कानून का निर्माण करने में सरकार की अहम भूमिका होती है । इसके लिए पक्ष और विपक्ष में रहे सभी दलों की सहमति और सहकार्य की आवश्यकता होगी । इस कार्य में वत्र्तमान सरकार अगर देर करती है तो संक्रमणकाल की अवधि और भी बढेÞगी जिसकी सारी जिम्मेदारी दाहाल सरकार पर होगी । ऐसे में प्रचण्ड सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि मधेश समस्या का समाधान तत्काल करे, संविधान संशोधन की प्रक्रिया आगे बढ़ाए तभी सकारात्मक वातावरण के परिप्रेक्ष्य में संविधान का कार्यान्वयन सम्भव है । पूर्व में वार्ता का जो ढोंग बार–बार किया गया उसकी पुनरावृत्ति न की जाय, इस बात का खयाल रखना होगा और पहाड़ तथा मधेश की दूरी को कम करना होगा ।
पिछली सरकार ने जो मंत्रालयों का अम्बार खड़ा किया था उसे कम करना, विकास की योजनाओं को आगे बढ़ाना, राजनीतिक नियुक्ति, हस्तक्षेप आदि गलत प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना ये सारी अपेक्षाएँ दाहाल सरकार से हैं । अब देखना यह है कि अपने निर्धारित समय में प्रधानमंत्री इस प्रतिकूल माहोल को कितना अनुकूल बना पाते हैं और उम्मीदों की कसौटी पर कितना खरा उतरते हैं ।

