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आध्यात्मिक यात्रा

 

रवीन्द्र झा ‘शंकर’
भारतीय संस्कृति में निरुक्त के अनुसार अध्यात्म का अर्थ है– ‘आत्माति’+‘अधि’ अर्थात् अपने शरीर के भीतर । तात्पर्य यह है कि शरीर के भीतर की इन्द्रिया, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार विभिन्न मनोयोगों तथा वृत्तियों इत्यादि को घात संघात तथा आत्मा एवं परमात्मा सभी को अध्यात्म सम्बन्धी अथवा अध्यात्मिक कहा जाता है । अतः अध्यात्म शरीर के अन्तरंगतम तत्व अथवा आत्मा का बोध शरीर के अन्तरंगतम तत्व अथवा आत्मा का बोध प्राप्त कर प्रत्यगात्मा अथवा परमात्मा तक पहुँचाने का साधन है । गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वभाव को ही अध्यात्म कहा है– ‘स्वभावोंऽध्यात्ममुच्ययते’ । (गीता ८।३) आदि शंकराचार्य के अनुसार यहा“ स्वभाव का अर्थ है– आत्मा अर्थात् शरीर को आश्रय बनाकर उसमें रहनेवाला तत्व, जो परमार्थत्ः ब्रह्म ही है ।
श्रीरामनुजाचार्य के अनुसार ः प्रकृति ही स्वभाव हैः वह अनात्मभूत्, किंतु आत्मा से सम्वद्ध सूक्ष्मभूत और उनकी वासना आदि का घोतक है । अध्यात्म परोक्ष हैः आत्मा उसका साक्षी हैः साक्षात् अपरोक्षत्व है ।
श्रीमद्भागवत में– परमात्मा तत्व के अन्तर्गत ब्रह्म को ज्योतिः स्वरूप मानकर बुद्धि के प्रकाशक के रूप में अध्यात्मदीप की संस्था से विभूषित किया गया है । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार घर का दीपक घर के सभी वस्तुओं को प्रकाशित करता हुआ स्वयं प्रकाशवान बना रहता है, उसी प्रकार परमात्मा तत्व भी अध्यात्म दीप है, जो प्रत्येक जीव या प्राणी के अपने आप में ही गृहदीप के समान प्रकाशित हो रहा है । ऐसी स्थिति में अपने घर में ही प्रज्ज्वलित दीपक को बाह्य जगत् में खोजना कहाँ की बुद्धिमानी है ? मनुष्य तो स्वयं अध्यात्म दीप है । जो स्वयं अपने को तथा अधिष्ठाता बनकर सभी पदार्थों को सतत् प्रकाशित कर रहा है । उसकी पहचान अथवा अनुभूति अध्यात्म दीपरूप धर्म से होती है । अतः अपने कल्याण के लिए हमें अध्यात्मविद् या अध्यात्मिवित् अर्थात् अपने भीतर के जटिल यन्त्र (पाँच ज्ञानेन्द्रिया, पाँच कर्मेन्द्रियाँ अर्थात् दस बाह्य कारण तथा चार अन्तःकरण कुल मिलाकर चौदह) के सञ्चालन एवं कार्यकलापों का समुचित ज्ञाता होना चाहिए ।
वस्तुत अध्यात्मिकता का अर्थ मात्र भौतिकवाद का विरोध नहीं है, वरन उसका आशय है– सच्ची आस्तिकता । आस्तिकता का अर्थ है– दृढ़ विश्वास और ईश्वर विश्वास से हमारा आशय है– एक ऐसी न्यायकारी सर्वोपरि सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करना, जो सर्वव्यापी है कर्मफल के अनुसार हमारे सम्पूर्ण जीवन का संचालन करती है । मनुष्य ईश्वर का पुत्र है तथा इसमें अपने पिता की अधिकांश विभूतियाँ बीज रूप में विद्यमान है । अतएवं शास्त्रों तक विधि से हमे अपने सत्व रूप का बोध प्राप्त कर ईश्वरीय विधि–व्यवस्था का यथाशक्ति पालन करना चाहिए ।
अध्यात्म के अन्वेषण में सबसे बड़ी बाधा है देहात्मबुद्धि अर्थात् भौतिक शरीर को ही आत्मा समझ बैठना । वास्तवमें आत्मा और शरीर सर्वथा पृथक हैं । हमने ‘स्वयम्’ को आत्मत्व से पूर्णतया अलग कर शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लिया है । इसी कारण हम आत्मोन्मुख न होकर बहिर्मुख बनकर भौतिक तथा निरन्तर परिवर्तनशील एवं नाशवान संसाधनों के उपलब्धियों में ही निरन्तर रत रहते है । यथार्थतः सच्चे सुख एवं शान्ति का स्रोत हमारे भीतर ही विद्यमान है अतएवं चंचल मन की निरन्तरता उठती हुई आकांक्षाओं को लुभावने जगत से हटाकर उसे अहंकार एवं राग देष आदि विकारों से मुक्तकर, सतत् अभ्यास द्वारा निर्विकार बनाकर आन्तरिक यात्रा की ओर उन्मुख करना है । असंख्य वृत्तियों को शान्तकर मन को वृत्ति शून्य तथा अकाम बनाना आत्मत्व की जागृति है । ऐसा करने के लिए ‘प्रत्याहार’ तथा ‘धारणा’ अपेक्षित है । ‘प्रत्याहार’ द्वारा इन्द्रियों के पीछे भटकनेवाले मन को खींच लेना तथा अन्तरमुखी बनाकर उसे कार्य–जगत से अलग करना है । तत्पश्तात् केन्द्रित करना ‘धारणा’ है । अतः एवं विकाररहित, परिशुद्ध मन को आत्मस्थ करना ही मनुष्य की आन्तरिक एवं अध्यात्मिक यात्रा है । तभी तो हमारे वौद्धिक ऋषियों ने मन के शुभ संकल्पों से युक्त होने की मंगल कामना की है ।
‘तन्ये मनः विशसंकल्पमस्तु’ वास्तव में सीमित जीव निस्सीम ब्रह्म का ही अभिन्न अंश है । यथार्थ में वह ब्रह्म ही है, किन्तु अविधा, अज्ञान अहंकार तथा माया से पूर्णतया अच्छादित होने के कारण वह अविनाशी परमात्मा को नहीं जान पाता । जीवन और ब्रह्म के बीच माया–मोह का जो परदा पड़ा हुआ है, उसी के कारण जीवन को ब्रह्म का दर्शन नहीं हो पाता । भगवान कृष्ण ने कहा है कि जीव ब्रह्म का अविच्छिन्न अंग (अंश) है– ममैवांशो जीवलोके जीव भूतः सनातनः । (गीता १५।१७) अतः आत्मसाक्षत्कार द्वारा ब्रह्म को जान लेना ही मानव–जीवन का परम उद्देश्य होना चाहिए ।
वास्तव में सम्पूर्ण अध्यात्मिक साधना का प्रारम्भ आत्मानुसन्धान में तथा उसकी परिणति आत्मसाक्षात्कार द्वारा परमात्मा की प्राप्ति है, सर्वोच्च ब्राह्मी स्थिति की अनुभूति है, जिसे हम परमगति, महायोग, निर्वाण तथा मोक्ष कहते है । आध्यात्मिक साधना की पराकाष्ठा पर पहुँच कर सर्वोच्च सोपान पर आरुढ होकर साधक कह उठता है– ‘शिवोरहम्’ ‘अहं ब्राह्मास्मि’ और ऐसी स्थिति की प्राप्ति ही मानव जीवन का चरम तथा परम लक्ष्य है ।
उपसंहार– सतत् अभ्यास द्वारा कुप्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर शुद्ध चित्त से आत्मदेश की ओर अग्रसर होना अध्यात्मिक उत्थान का सदृढ सोपान है । आत्मानुसन्धान द्वारा अपने स्वभाविक स्तस्वरूप का साक्षात्कार करना ही ब्राह्मी स्थिति प्राप्त करना है, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति पूर्णतया कृत्य–कृत्य हो जाता है । इस उदात स्थिति को पराभक्ति भी कहा गया है । स्वस्वरुपनानुसन्धानं भक्तिरित्याभिधीयते । (विवेक चुड़ामणि ३२) ।

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