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ब्लुचिस्तान की गुहार भारत सहायता करे

 

२०,अगस्त |

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ही झटके में पाकिस्तान को न सिर्फ बचाव की मुद्रा में ला दिया है बल्कि व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष यह बात पुरजोर तरीके से रख दी है कि बलूचिस्तान के रूप में कश्मीर से बड़ा मुद्‌दा मौजूद है, जिसका समाधान होना बाकी है। इसके साथ पाक अधिकृत कश्मीर की हकीकत भी सामने रख दी है कि वहां भी सब कुशल मंगल नहीं है और वहां कश्मीर घाटी से ज्यादा दमनचक्र जारी है। युद्ध मैदान में ही नहीं लड़े जाते बल्कि सामरिक चालें चलकर उससे भी अधिक कारगर नतीजे हासिल किए जा सकते हैं। पाकिस्तान के प्रति विदेश नीति बदले बिना रणनीति में बदलाव इसी का सबूत है।

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इशारा साफ है, भारत भी पाकिस्तान की एकता-अखंडता को निशाना बना सकता है। 13 लाख आबादी और पाकिस्तान के 44 फीसदी इलाके में फैला बलूचिस्तान पाक की दुखती रग रहा है, लेकिन भारत ने कभी इस पर हाथ नहीं रखा। वरना सिंधु घाटी की सभ्यता का धुर पश्चिमी छोर और द्राविड़ी आनुवांशिक गुणों वाले कुर्द मूल के लोगों का इलाका ऐतिहासिक रूप से भारत से ज्यादा नज़दीकी रखता है। इस नाते ही सही भारत को बहुत पहले ही बलूचिस्तान की हकीकत दुनिया के सामने रखनी थी। हर विचार का एक वक्त होता है, शायद इसका यही सही वक्त था, क्योंकि वैश्विक आतंकवाद के स्रोत के रूप में पाकिस्तान की पहचान स्थापित होने के बाद अपने ही लोगों पर सैन्य आतंक जाहिर होना तार्किक परिणति है।

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मौजूदा बलूच आंदोलन की जड़ें 1966 में बलूचिस्तान के इलाके कलात में मीर अहमद की ‘खानत’ (रियासत) में हैं। बंटवारे के समय वहां ब्रिटिश शासन के अधीन कलात रियासत का वजूद था, जिसने पाकिस्तान में शामिल होने से इनकार कर दिया। मार्च 1948 में पाक ने सेना भेजकर तत्कालीन शासक यार खान से विलय की संधि पर हस्ताक्षर करवा लिए, लेकिन उसके भाइयों ने संघर्ष जारी रखा।

पाकिस्तान के लिए बलूचिस्तान का बहुत महत्व है, क्योंकि यहां गैस, यूरेनियम, तांबा, सोना और अन्य धातुओं के विशाल भंडार हैं। इसके गैस भंडारों से आधे पाकिस्तान की जरूरत पूरी होती हैं। मध्य एशिया में प्रवेश के लिए चीन जिस ग्वादर बंदरगाह का निर्माण कर रहा है, वह यहीं है। जिस ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन का बड़ा शोर है वह भी बलूचिस्तान से गुजरती है।

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यह सब तभी होगा जब यहां शांति होगी, लेकिन इसके लिए या तो बलूच लोगों के साथ पाक किसी करार पर पहुंचे या उनका सैन्य दमन करे। उसने दूसरा रास्ता चुना। वह शायद ऐसा अकेला देश होगा, जिसने अपनी ही आबादी पर एफ-16 विमानों से बम बरसाए। बलूचों के नेता अकबर बुगती को तो गुफा में मिसाइल दागकर मारा गया।

बाहर से लोग लाकर बसाए जा रहे हैं। दुनिया से बलूचिस्तान को काट दिया गया है। मीडिया को वहां बिल्कुल जाने नहीं दिया जाता। बलूचों का लक्ष्य तो वृहद स्वतंत्र बलूचिस्तान बनाना है, क्योंकि इसके इलाके ईरान और अफगानिस्तान में भी फैले हुए हैं। मध्य एशिया में प्रवेश और वहां से हिंद महासागर के लिए सबसे आसान राह होने के कारण अफगानिस्तान सहित पूरा इलाका महत्वपूर्ण है।

1893 में ब्रिटिश सरकार ने तब के भारत और अफगानिस्तान को अलग करने के लिए मनमानी ड्यूरेंड रेखा खींचकर सीमा बना दी। अब यही रेखा पाकिस्तान व अफगानिस्तान के बीच विवाद की वजह है। यह भी पाक की एक और दुखती रग है। पाकिस्तान को बांग्लादेश जैसी स्थिति की चिंता नहीं होगी, क्योंकि बलूच लोगों में पूरे दक्षिण-पश्चिमी हिस्से पर कब्जे की क्षमता नहीं है। बाहरी मदद से ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि अफगानिस्तान आंतरिक संघर्ष में फंसा है और भौगोलिक परिस्थिति भारत को उतनी स्वतंत्रता नहीं देती। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय इन बारीकियों में नहीं जाता।

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खुद पाकिस्तानी मानस में भी बांग्लादेश जैसी स्थिति का खौफ तो है ही। कश्मीर में जिस मानवाधिकार का पाकिस्तान रोना रोता है, बलूचिस्तान में उसका रिकॉर्ड इस मामले में बहुत ही शर्मनाक है। हर सुबह मुर्गे की बांग की तरह पाक नेता कश्मीर-कश्मीर की रट लगाते हैं, अब उन्हें बलूचिस्तान में दमन की सफाई देने में पसीना आ जाएगा। मोदी ने पाक अधिकृत कश्मीर का सिर्फ उल्लेख किया है।

नॉदर्न एरिया है, जिये सिंध का आंदोलन है, पाक की और भी दुखती रगें हैं। दरअसल, पाकिस्तान का विचार पंजाबी प्रभुत्व वाले इलाके का ही विचार था और बाकी जातीय समूह हमेशा इसके साथ बेचैन बने रहे हैं। यह हकीकत आज जितनी शिद्‌दत से महसूस हो रही है, उतनी पहले कभी नहीं महसूस हुई थी।

 

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