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पनप रहा है ट्युशन व्यापार : विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’

 

विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’ काठमांडू ,२८ अगस्त |

बात १७ अगस्त की है । उस दिन यूनिवर्सिटी में स्नातकोत्तर प्रथम सेमेस्टर की परीक्षा थी और मैं निरीक्षक में शामिल था । लगभग ४ बजे पांव पैदल टी.यू. गेट के निकट आए । रास्ते में टी.यू. के एक लब्ध प्रतिष्ठ प्रोफेसर से मुलाकात हुई । बात करते–करते हम दोनों बल्खु स्थित उनके घर पर गए । बहुत सारी बातें हुई । इसी क्रम में एक अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला ‘प्राइवेट ट्युशन’ करनेवाले प्राध्यापकों पर आ कर अटक गयी । प्रोफेसर साहब बोले– ‘हमारे यहाँ ऐसे उस्तादों की गिनती बहुत कम है, जो ट्युशनें करते हों । हाँं, कुछ लोग शाम को कोचिंग में पढ़ाने में जाते हैं और पेट्रोल बगैरह का खर्चा निकाल लेते हैं ।’

 

विश्वविद्यालययों के अध्यापक ट्युशन बहुत कम करते हैं, यह शायद बहुत गलत तथ्य नहीं है और ऐसा शायद इसलिए है कि उस स्तर के विद्यार्थी ट्युशन बहुत कम लेते हैं, पर कॉलेजों में ऐसे शिक्षकों की भी बहुत कमी नहीं है, जो निजी क्लास पढ़ाने जाते हैं और भरपूर फीस लेते हैं । वाणिज्य, भौतिक, रसायनशास्त्र और गणित के कुछ निजी ट्युटरों का तो इतना नाम है कि उन्हें मुंहमांगी फीस मिलती है ।

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इस स्थिति का लाभ कॉलेज शिक्षक सबसे ज्यादा उठाते हैं, पर यह बीमारी अब बिराटनगर, राजविराज, जनकपुर, वीरगंज आदि शहरों में भी फैल रही है और वहाँ इन चार–पाँच विषयों के शिक्षकों की तूती बोलती है । एक अनुमान के अनुसार काठमांडू जैसे शहर में ट्युशनों पर उतर आनेवाला गणित का शिक्षक, जो स्कूली छात्रों को भी पढ़ाने में कोई संकोच नहीं करताtution-2, २० हजार रुपये महीने अपने बेतन के अलावा कमाता है ।

लेकिन ट्युशनों की असली महामारी स्कूलों में फैल रही है । एक अंदाज है कि अकेले राजधानी में कोई ४–५ हजार स्कुल शिक्षक ट्युशनें पढ़ाने का नियमित धन्धा करते हैं और उनकी आमदानी १०–१५ हजार रुपये महीने तक है । इस आमदनी का न तो कोई हिसाब–किताब रखा जाता है और न कोई टैक्स दिया जाता है । स्कुल अधिकारियों द्वारा ऐसे शिक्षकों से पूछताछ करना तो दूर, बहुत से स्कुल तो ट्युशन संस्कृति को खुला बढ़ावा भी देते हैं ।

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बहरहाल, ट्युशन उद्योग अगर एक घरेलू उद्योग के रूप में फल–फूल रहा है तो वह कॉलेज नहीं, स्कुली क्षेत्र में ही अधिक व्यापक है । ऐसी संस्थाएँ हैं जहाँ के शिक्षक एक घन्टे का एक हजार तक फीस लेते हैं । इयसे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये महीने में कितना कमा लेते होंगे ।कुछ ट्युशन एजेंसियों के अनुसार, जो अपना नाम गुप्त रखना चाहती हैं, इसमें काठमांडू में साल में करोड़ों का लेन–देन होता है । राजधानी के कुछ ट्युशन–व्युरो जो ट्युशनें दिलाने का धन्धा करते हैं, लाखों कमाते हैं । कुछ के पास तो वातानुकुलित दफ्तर हैं, टेलिफोन है, एकाउंटेंट हैं, गाड़ियां है और उनकी कंप्युटर–फाइलों में शिक्षकों का ‘बायोडेटा’ और अभिभावकों की प्रतिक्रियाएं भी दर्ज हैं ।

कमीशन के रूप में अधिकतर ‘ट्युशन व्यूरो’ पहले महीने की ट्युशन फीस की एक तिहाई और शेष महीनों की ट्यूशन फीस का १५ से २० प्रतिशत लेते हैं । यह पैसा ट्युटर देता है, न कि ट्यूशन करानेवाला या अभिभावक । इस हिसाब से अगर किसी व्युरो के पास ट्युटर बाजार में लगे हुए हैं, तो उनकी कुल आमदनी का एक बड़ा हिस्सा एजेंट के पॉकेट में चला जाता है । हाँ दफ्तर के रखरवाव और विज्ञापनों पर उसका खर्च जरुर बहुत ज्यादा है, बहुत से एजेंट तो ‘मेट्रिक पास’ भी नहीं हैं, पर उनकी चतुराई और कार्य कुशलता में कोई कमी नहीं है ।

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प्राध्यापक महोदय, आगे कहते हैं कि ‘ट्युशनें अभिभावक नहीं दिलवाते । कुछ शिक्षक अपने छात्रों के जरिये अभिभावकों से खुद मिलते हैं । कुछ अखवारों में विज्ञापन देते हैं । कुछ विज्ञापनों के जवाव में टेलिफोन से सम्पर्क करते हैं, और कुछ तो ट्युशन एजेंसियों के नियमित सदस्य हैं, और उन्हें कम मिलता रहता है । असली समस्या यह है कि आज हिन्दी, इतिहास, भूगोल, अंग्रेजी और सामाजिक शिक्षा आदि पढ़ानेवाले शिक्षकों का जीवनस्तर गिर रहा है । क्योंकि ट्युशन के बाजार में उनकी कोई पूछ नहीं है, जिसका असर स्कुली शिक्षा पर अच्छा नहीं पड़ रहा है ।

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