प्रचण्ड ..प्रतापी ..भूपति, परन्तु न गम्भीर हैं, न प्रतापी हैं, प्रचण्ड : गंगेशकुमार मिश्र
गंगेश कुमार मिश्र , कपिलबस्तु,२२ अक्टूबर |
” श्रीमान् गम्भीर नेपाली,
प्रचण्ड प्रतापी भूपति ।।”
ऐसा लगता है, चक्रपाणि चालिसे ने भविष्य देख लिया था; जो पूर्व राष्ट्रगान में इन दो पंक्तियों को समावेश किया। परन्तु न गम्भीर हैं, न प्रतापी हैं, प्रचण्ड । भूपति, भूल से पति ( देश के मालिक ) बन बैठे।

दोबारा प्रधानमन्त्री की कुर्सी पर आसीन, पुष्प कमल दहाल ‘ प्रचण्ड ‘ जी से थोड़ी उम्मीद तो थी, मधेश को। क्योंकि संघीयता प्रमुख मुद्दा रहा था, माओवादियों का। परन्तु आज उस मुद्दे को ही दरकिनार कर दिया है इन्होंने और अपने पूर्ववर्ती ओली जी की तरह ही, देश को हाँके जा रहे हैं।
संविधान संशोधन में बहानेबाज़ी को निरन्तरता दिए जा रहे हैं। कुर्सी पर बैठते ही कुछ अहम् फैसले अवश्य लिए थे इन्होंने, पर पुराने मुद्दे; संघीयता को भुलाए जा रहे हैं।
” गले की फाँस संघीयता,
अटकती साँस संघीयता ।।”
ऐसा निवाला जो, न निगलते बने, न उगलते बने; आज संघीयता की हालत यही तो है; इस देश में। गाँवपालिका, नगरपालिका निर्वाचन के नाम पर ग़ुमराह किया जाना; इस देश में संघीयता का अपमान नहीं तो और क्या है ? स्थानीय निकाय निर्वाचन कराने की जिम्मेदारी, प्रान्तीय सरकार को होनी चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं हो रहा। आनन- फानन किसी भी तरीके से स्थानीय निकाय निर्वाचन कराना चाहती है सरकार; जैसे संविधान को लायी थी। इससे स्पष्ट होता है कि संघीयता की चाहत केवल छलावा है, वास्तव में यह सरकार, देश को उलझाए रखना चाहती है, जिससे अपना कार्यकाल आसानी से पूरा कर सके।
संविधान संशोधन की प्रक्रिया ठंढे बस्ते में है, सीमांकन का मुद्दा जस का तस है; कैसे कराएगी सरकार, स्थानीय निकाय निर्वाचन ? यह यक्ष प्रश्न है, इसका समाधान नहीं है किसीके भी पास, बस आस बची है अब तो।

