ओली की बोली, तबतक नहीं सुधरेगी; जबतक मधेशी नेताओं की आदत नहीं बदलेगी
गंगेश कुमार मिश्र , कपिलबस्तु ,२३ अक्तुबर |
☆अहंकार की बलिवेदी पर, सब कुछ क़ुर्बान करने को तत्पर रहने वाले मधेशी नेतागण कब जागेंगे ?
☆जातीयता की अंधी दौड़ को छोड़, मधेशी नेतागण; समरसता और एकता को कब साधेंगे ?
☆साथियों का साथ छोड़, मधेशी नेतागण; अकेले चलने की आदत कब त्यागेंगे ?

” रस्सी जल गई पर, बल नहीं गया “।
जब सत्ता में थे, आग उगलते थे। अब सत्ता में नहीं हैं, फ़िर भी झुलसा रहे हैं। जिसके प्रमुख कारक तत्व हैं, मधेशी नेताओं में अहम् की टकराहट; सर्वमान्य नेतृत्व का अभाव, जातीय विभाजन ।
राजशाही के पश्चात्, सुनियोजित तरीके से मधेश में पहाड़ी बस्तियों का विस्तार द्रुत गति में किया गया; जिसका एक मात्र उद्देश्य, मधेश में मधेशियों को अल्पसंख्यक बनाना रहा। इस पर सबसे पहले आवाज़ उठाई थी; नेपाल सद्भावना पार्टी ने। स्व. गजेन्द्र नारायण सिंह ने पूर्व मेची से लेकर पश्चिम महाकाली तक, इसी संदेश को प्रसारित करने के लिए यात्रा की । जो बातें उन्होंने कही थीं, आज अक्षरशः सत्य प्रमाणित हो रही हैं; और इस घड़ी में मधेश अपने आपको, नेतृत्व विहीन महसूस कर रहा है।
जातीयता की अंधी दौड़ नें, मधेश और मधेशियत को कलंकित किया है। गुटबंदी है, अकेलापन है, किसीके नेतृत्व को कोई स्वीकारने को तैयार नहीं है।
इसी बात का रोना है और यह बात ओली जी समझ रहे हैं; इसीलिए बोले जा रहे हैैं, बेझिझक, बे-रोकटोक ।
मधेश आन्दोलन को मन्थर करने में, हमारे मधेशी नेताओंने ही अहम् भूमिका निभाई; अपने अहम् की क़ीमत चुकाई; अभी भी कोई झुकने को तैयार नहीं है, सभी सीना ताने एक-दूसरे को नीचा दिखाने को उद्धत हैं। क्या यह बात ओली नहीं, समझ रहे हैं ? चतुर-सुजान ओली सब समझते हैं; उन्हें बल हमारे मधेशी नेतागण ही तो, दे रहे हैं।

