मोदी – एक सुहाना सफर… मोदी से विश्व भी बहुत बडा आश लगाये बैठा है

कैलाश महतो, परासी, नवम्बर |
दुनियाँ के राजनीतिक मंचो पर भारतीय प्रधामन्त्री नरेन्द्र मोदी ने अपना एक अलग पहचान बना चुका है । भारत में भले ही मोदी के कुछ विरोधी हों, पर संसार उनको एक सफल, साहसी और दुरदर्शी राज नेता के रुप में सम्मान करने लगी है । राजनीतिक दृश्य में लोगों ने अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति विल क्लिन्टन और भारत के प्रधानमन्त्री मोदी को अपने आवाज में ही अपने राष्ट्र को ढोते हुए देखा है । राजनीतिक मञ्चों पर जब ये दो नेता चढे तो इनके लब्जों में अपने देश, जनता और उनकी गौरब इनके शरीरों के हर अंगों से झलकते देखा गया है ।
मोदी अपने विरोधियों के लिए करारा जबाव, उदण्डों के लिए तेज काँटा, दुश्मनों के लिए त्रास, भ्रष्टों के लिए नसीहत, बेइमानों के लिए रोडा, बदमासों के लिए दण्ड, गुण्डों के लिए सजा, समस्याओं के लिए समाधान, चुनौतियों के लिए पहलवान, गरीबों के अभिभावक, व्यापारियों के हमदर्द, सज्जानें के लिए सहारा, अन्धों के लिए ज्योती, बेराहों के लिए राह तथा देश और जनता के लिए एक सुहाना सफर पमाणित हो रहे हैं । यही कारण है कि संसार मोदी को अपना एक साहसी हमसफर मानने लगा है ।
उन्होंने अपने चुनावी अभियान के क्रम में भारत में भ्रष्टाचार को एक अहम् समस्या बताते हुए उसे खत्म करने की भरोसा लोगों को दिया था । भारत को दुनियाँ का ताकतवर देश भी बनाने का दावा किया था । भारत से गरीबी को भगाने का आवाज दिया था । प्रधानमन्त्री होने के बाद उनके विरोधियों ने उनके वादों को मुद्दा बनाकर उन्हें घेरने, बदनाम करने और असफल दिखाने के लिए जो अख्तियारी अख्तियार की, उसका करारा जबाब उन्होंने नोवेम्बर ८ तारीख को दे ही दी । जब उनकी यह उद्घोष हुई कि ७० सालों से परम्परा बना चुकी भ्रष्टाचारों को राकने के लिए भारत में चलते आ रहे रु.५०० और रु.१००० के नोटों के प्रयोगों पर पाबन्दी लगा दी गयी है तो कितनों की दम निकलने लगी तो कितनों के होश उड गये । कितने सदमें में पड गये तो कितनों की नींद उड गयी । कुछ की विरोध आनी शुरु हुई तो करोडों आम लोगों ने मोदी के इस कदम को सराहा और स्वागत किया, भलेही उन्हें कुछ मुसीबतें उठानी पड रही हैं । मोदी के इस साहसी और चुनौतीपूर्ण कदम को मधेश भी स्वागत करता है ।
भ्रष्टाचार सिर्फ भारत या किसी एक देश का आन्तरिक समस्या ही नहीं, अपितु यह अन्तर्राष्ट्रिय समस्या बन गया है । भ्रष्टाचारमुक्त भारत से ही भारत का समस्या समाधान पूर्ण रुप से नहीं हो सकता । मोदी से विश्व भी बहुत बडा आश लगाये बैठा है । लोग यह मानने लगे हैं कि सिर्फ विशाल भारत ही नहीं, भारत को नेतृत्व देने बाला मोदी के सोंच, योजना, साहस और तरकीबें भी विशाल हैं । विशाल भारत और उसके नेतृत्व को अब विशाल दायरे से विश्व के नेतृत्वों में भाग लेकर भ्रष्टाचाररहित संसार को निर्माण करना होगा । क्यूँकि लोग राजनीति राजनीतिक शक्ति, पद, शासन और पैसों के लिए करते हैं । जब राजनीति शासन और पैसों से जुड जाती है तो भ्रष्टाचार अपने आप जड जमा देती है । उस अवस्था में अब्राहम लिंकन, लूला डा सिल्वा, कृष्ण प्रसाद भट्टराई आदि जैसे विश्व राज नेताओं की आवश्यकता होती है ।
भारत एक ऐसा देश है जो आजाद होकर भी आजादी को दुत्कारता रहा है । गुलामी की पीडा को भोग चुके भारत अपने पडोस में ही उसके गुलामी को अनदेखा करता रहा है जिनहोंने भारत के आजादी में अपनी खून, पसीना और सम्पति की आहुतियाँ दी है । नेपाल कहे जाने बाले मधेश पर नेपाली शासकों द्वारा हो रहे सदियों के अन्याय और अत्याचारों को प्रशय देने का काम होता रहा है । मधेश ने जब भी बदलाव या मुक्ति चाही, भारत उसे नेपालियों के नापाक गोद में डालने का काम किया ।
भारत सिर्फ यह समझता रहा कि आवश्यकता अनुसार मधेश को उचालकर और नेपाली शासकों को मिलाकर चलने से उसे हमेशा नेपाल की पानी और जवानी नसीब होता रहेगा । (जिसे मोदी ने नेपाल के संसद में ही कह चुका है कि नेपाल की पानी और जवानी नेपाल के वश में नहीं रह सकता) इसी दर्शन के आधार पर मधेश को उपनिवेश बनाकर रखने बाले नेपाली शासकों को उसने पालकर अपना बिजयोत्सव मनाता रहा है । विश्व रंगमंच पर राजनीतिक हैसियत रखने बाला भारत कभी यह देखा ही नहीं कि उत्तर के अपने पडोस में अपने ही खर्च से उसने अपने दुश्मन को पाल रहा है । वो जिसे खिला पिला रहा है, जिसका वो सरकार बना रहा है, जिसे वह मित्र मानता रहा है, वे दिन रात उसके विरोध में आग उगलता है, उसे दुश्मन मानता है और भारत के अहित चाहने बालों को नेपाल में प्रशय देता है । भारत अगर ध्यान दें तो बिना लगानी के वह उत्तर के तरफ से कई गुणा सुरक्षित बन सकता है । नहीं तो कल्ह उत्तर उसके लिए भारी समस्या के रुप में खडा होना निश्चित है ।
हर अवसर और अधिकारों से मधेशियों को वञ्चित रखने बाला नेपाली शासन ने उन्हें तकरीबन ८ सालों से भारतीय और नेपाली मुद्रा विनिमय में शोषण करता आया है । करीब ९० प्रतिशत काम और सम्बन्धों को लेकर भारत और मधेश में आने जाने बाले मधेशी और भारतीय समेत को हैरान, परेशान और आर्थिक दोहन करने के मानसिकता से जिस नेपाली शासन तथा नेपाल राष्ट्र बैंक ने भारतीय कुछ अधिकारी और तस्करों को मिलाकर कथित रुप में भारतीय रुपयों का अभाव दिखाकर मधेशियों को लुटता आया है, आज उसी नेपाली शासकों के पास दश हजार करोड भारतीय रुपये कहाँ से आ गया जिसको बदलने के लिए भारत सरकार से नेपाल फरियाद कर रहा है और नेपाली अर्थमन्त्री यह धम्की तक दे देता है कि भारत अगर उसके पास रहे रु.५०० और रु.१००० के वे दश हजार करोड नहीं बदलेगा तो वो उसके विरुद्ध लडेगा जबकि भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके द्वारा जब नेपाल को सिर्फ तीन करोड रुपये ही दिये गये हैं तो बाँकी के रकम आये कहाँ से । समाचारों के अनुसार नेपाल के वर्तमान प्रधानमन्त्री प्रचण्ड के पास सन् २००८ में सम्पति के नाम पर तीन चार लाख ने.रु. का एक कट्ठा सात धुर घर घडारी और दो तोले सोना मात्र थे । आज भारत के बडे नोटों पर रोक लगाने के बाद उनके पास उन्हीं बडे नोटों बाला एक अरब भारतीय रुपये कहाँ से आ गये ?
और इस तरह मधेश और मधेशियों को दोहन करने में नेपाली शासन रहे तो उसे सहयोग करने में जान अन्जान में भारतीय शासन का कहीं न कहीं हाथ रहता आया है । भारत के लोगों ने न जाने कौन से इतिहास को पढ लिया है कि जब मधेशियों को कोई भारतीय नेता भी मिल जाये तो यही कहते सुना जाता है कि अब तो मधेशी का समस्या सुलझ गया न ? भारत ने तो आप लोगों को सहयोग किया न ? संविधान तो बन गया न ? अधिकार तो मिल गया न ?

