एमाले देश को, विखण्डन की ओर ले जाने पर अमादा
ओली और एमाले देश को, विखण्डन की ओर ले जाने पर अमादा हैं;
बन्द से कोई राजनीतिक समाधान, निकलने वाला नहीं है।
गंगेश मिश्र

” शर्म भी शरमा जाए,
हरक़त ऐसी करते हो,
छिल डाला, छाल-छल से;
फ़िर भी,
राष्ट्रीयता की, बात करते हो।
देश, देश न रहा;
ज़मीर है मर रहा,
पर तुम, मुस्कुराए जा रहे हो।
शर्म भी शरमा जाए,
हरक़त ऐसी करते हो।
क़ब्र में हैं पाँव,
दाँव पर दाँव, चले जा रहे हो।”
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पश्चिमांचल बस व्यवसायी समिति, बुटवल ने बन्द को अपरोक्ष रूप में समर्थन करते हुए; बस का आवागमन ठप्प किया हुआ है। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि कोई कुछ भी बहाना करे; किन्तु एक समुदाय विशेष संगठित तरीके से मधेश और संघीयता के विरोध में एकजुट है। ये लोग किसी भी क़ीमत पर,
शक्ति को विकेन्द्रित नहीं करना चाहते; यही वज़ह है, कि ये लोग संघीयता से घबराने लगे हैं।
ओली जी को अपने निहित स्वार्थ के अलावा, कुछ देखना ही नहीं है; और वे देख भी नहीं रहे हैं।उन्हें लगता है कि इस नौटंकी से आने वाले चुनावों में, वे सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेंगे; पहाड़ी जनमत उनके साथ होगा। यही वज़ह है कि वे थोथा राष्ट्रवाद का नारा देकर, देश और पहाड़ी समुदाय को ग़ुमराह कर रहे है; जिससे किसीका भला होने वाला नहीं है।
यही हाल अन्य पहाड़ीवादी दलों का भी है,
वे कुछ भी कहें, संघीयता के पक्षधर तो बिलकुल नहीं हैं।अरे भई ! सीधी सी बात है, संघीय व्यवस्था होते ही इन्हें अपने अधिकारों में कटौती करनी पड़ेगी; सत्ता केन्द्रीकृत नहीं रह जाएगी।जो मलाई अकेले ही गटक जाते थे, उसे बाटना पड़ेगा; इसलिए संघीयता से किसी भी तरीके से पीछा छुड़ाना चाहते हैं; ये लोग।
मधेश आन्दोलन का माख़ौल उड़ाने वाले,
जब ख़ुद सड़क पर आते हैं; तो इसे सही ठहराते हैं। मधेश का भला कोई सोचने वाला नहीं है, हाँ अवसर को भुनाने का प्रयास अवश्य होता है।
संघीयता बिना मधेश का, इस देश कल्याण संभव ही नहीं है; क्योंकि ये लोग सत्तासुख का भरपूर उपभोग करना जानते हैं; हिस्सेदारी इन्हें रास नहीं आ रही।

