Wed. Jun 10th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें himalini-sahitya

त्रुटीपूर्ण पाठ्यपुस्तक छापना गैरजिम्मेवारी ही नही शैक्षिक अपराध भी हैे : भाषाविद्

 

academy

विजेता, काठमाडौं, १६ माघ । नयें शैक्षिक शत्र में नेपाली किताब फिर से त्रुटीपूर्ण वर्णविन्यास के साथ प्रकाशित होने जा रही है । व्याकरण व भाषा में अशुद्धि पढ़ाकर  छात्रों पर पडनेवाले प्रभाव को नजरंदाज करते हुये पाठ्यक्रम विकास केन्द्र ने इसबार भी गलत रहें पाठ्यपुस्तक को ही छापने में जुटी है ।
वर्णविन्यास सम्बन्धी त्रुटीपूर्ण निर्णय के साथ लाखों विद्यार्थियों को अबतक गलत ही पढाई जाती है |इसको सुधारने के प्रति सम्बन्धीत निकाय नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान तथा त्रिवि नेपाली केन्द्रिय विभाग अभी भी जिम्मेवार नजर नहीं आती ।
पाठ्यक्रम विकास केन्द्र के कार्यकारी निर्देशक कृष्णप्रसाद काप्री ने नईं शैक्षिक शत्र के लिए नेपाली किताब पुराने (त्रुटीपूर्ण) वर्णविन्यास के साथ ही छापे जाने की बात बताई है। उन्होंने इस विषय का मुद्दा सर्वोच्च में चल रहा है |  मन्त्रालय से भी संशोधन करके छापने का कोई निणर्य नहीं आने के कारण पुराने रुप में ही छापने की जानकारी दी ।
इस सन्दर्भ में नेपाली भाषाविद् शरच्चन्द्र वस्ती बताते हैं कि गल्ती एवम् त्रुटी होने की जानकारी होते हुये भी विभिन्न बहाना में लाखोंलाख विद्यार्थियों को पढाना शैक्षिक अपराध हैे । उन्होंने इसे शिक्षा के उपर हो रही अराजकता की संज्ञा दिया ।
भाषाविद् वस्ती ने नईँ पुस्ता को विकृत राह के तरफ ले जानेवाली यह कार्य जितनी जल्दी हो सके रोकना चाहिये बताया । उन्होंने कहा कि जिसने सिफरिस किया था उसी ने गलत होने की बात स्वीकार कर ली है | इसलिए  मन्त्रालय को आपना निर्णय सुधारकर जल्द से जल्द शुद्धाता की ओर जाना चाहिए बताया । वस्ती ने कहा कि जानाजान गल्ती रहे पाठ्यपुस्तक छापना गैरजिम्मेवारी मात्र न होकर अपराध है ।
नयाँ शैक्षिक शत्र शुरू होने में अब लगभग ६५ दिन मात्र बाँकी है । त्रुटीपूर्ण किताब छप रही है लेकिन शिक्षा मन्त्रालय व इस अन्तर्गत के पाठ्यक्रम विकास केन्द्र तथा उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद ने आपना विगत का निर्णय खारेज कर त्रुटी सुधारने की विषय पर अभी भी मौन है ।
पाठ्यक्रम विकास केन्द्र के कार्यकारी निर्देशक काप्री बताते हैं कि प्रज्ञा प्रतिष्ठान व नेपाली केन्द्रिय विभाग ने हिज्जे व वर्णविन्यास के सम्बन्ध में अपरिपक्व निर्णय किया है लेकिन मन्त्रालय का निर्णय नही ओने से हमे परेशानी है ।
पाठ्यपुस्तक के भाषा सुधारने के सम्बन्ध में मन्त्रालय व अन्य निकायों के वेवास्ता देखते हुए उक्त समस्या जल्द समाधान होने की संभावना नजार नहीं आती ।
इस सम्बन्धमें नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान के कुलपति डा. गंगाप्रसाद उप्रेती ने नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान ने जनता के अपेक्षा व प्राज्ञिक क्षेत्र के भावना को समझते हुये समायोजित कदम उठा चुकी है एवम् अब सरकार को भी इस तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है बताया ।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *