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मांगें पूरी होने के बाद ही चुनाव करवाया जाए : भुपनारायण रामदास

 

मुफस्सल की आवाज

Bhupnarayan Ramdas

देश अभी बहुत तरल अवस्था से गुजर रहा है । आशय यह है देश में दो–दो बार संविधान सभा का चुनाव हुआ । लेकिन जिनके लिए संविधान बनना चाहिए था अर्थात् जिस संविधान से मधेशी, दलित, जनजाति, अल्पसंख्यक समुदायों का पूर्ण अधिकार मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल सका । उनके अधिकारों की कटौती कर सत्ताधारियों द्वारा फिर से वर्गलाने का प्रयत्न किया जा रहा है । खासकर २०४६÷०४७ से इधर दलित आंदोलन, जनजाति आंदोलन, पिछड़ावर्ग आंदोलन आदि जितने भी आंदोलन हुए सरकार द्वारा उन सभी आंदोलनों की आवाजों को जवर्दस्ती दबाई गयी । सरकार ने छह दर्जन से अधिक मधेशी सपूतों की जानें ली एवं औरों को मारने का प्रयत्न भी किया जा रहा है । उन्हें फिर से वोट बैंक के रूप में प्रयोग करने की साजिशे की जा रही है । यहां तक की मधेशी, दलित, जनजाति, अल्पसंख्यक आदि समुदायों की मांगों को दरकिनार कर जबरन पुरानी प्रक्रिया के तहत चुनाव करवाया जा रहा है । इस प्रकार देखा जाय तो हम कह सकते हैं कि देश की स्थिति भयावह होती जा रही है । अगर ऐसी ही स्थिति बरकरार रही तो देश में कुछ भी हो सकता है । देश में अशांति हो सकती है, बाहरी शक्तियां भी हावी हो सकती हैं ।
अब जहां तक सवाल है चुनाव होने का तो हमारी पार्टी का निर्णय है कि पहले हाशिये पर रहे मधेशी, दलित, जनजाति, अल्पसंख्य समुदायोंं की जायज मांगें पूरी हो, उसके बाद ही चुनाव करवाया जाय । लेकिन फिलहाल सरकार तथा कथित बड़ी पार्टियों के द्वारा हिस्से की बात न होकर सिर्फ चकलेट खिलाने की बात की जा रही है । इसलिए जब तक हाशिये पर रहे समुदायों की मांगें पूरी नहीं हो जाती, तब तक चुनाव होने की संभावना नहीं दिखाई दे रहा है, ऐसा मुझे लगता है । हां. अगर समय में ही उनकी मांगें पूरी हो जाती है, तो चुनाव हो सकता है । क्योंकि चुनाव होना आवश्यक है । चुनाव लोकतंत्र का मेरुदंड है । और चुनाव के बिना देश में पूर्णरुपेण विकास होना भी असंभव है ।
(भुपनारायण रामदास, दलित शक्ति नेपाल सर्लाही के संयोजक तथा नई शक्ति पार्टी के केन्द्रीय परिषद सदस्य हैं ।)

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