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लोकतंत्र दिवस : क्या सच में नेपाल में लोकतन्त्र जीवित हैं ?

 

loktantra

हिमालिनी डेस्क
काठमांडू, २४ अप्रील ।
लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ लोगों का, लोगों के द्वारा और लोगों के लिए, नहीं है । इसका व्यापक अर्थ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक लोकतंत्र है ।
कोई भी देश सही रूप में तभी लोकतांत्रिक है यदि देश में रहने वाले सभी लोगों को समान सामजिक अवसर और प्रतिष्ठा प्राप्त हो, जब देश के सभी लोगों को सामान आर्थिक अवसर मिलें और देश के सभी लोगों को राजनीति में समान भागीदारी प्राप्त हो । उसी देश को लोकतान्त्रिक देश मना जा सकता हैं ।

आज ११ वाँ लोकतन्त्र दिवस के अवसर पर नेपाल में बड़ी धुमधाम के साथ मनाया जा रहा हैं । लेकिन लोकतन्त्र के आभाष सारें देश के जनता अभी भी अनिभुत नहीं कर रहें हैं ।

आधी से ज्यादा अबादी ने संविधान अस्वीकार किया हैं । अभी देश निर्वाचनों के दौड से गुजर रहा हैं, फिर भी कोइ ये नहीं कह सकता हैं की निर्वाचन होगें या नहीं ? आखिर क्यो क्या र्एैसी अवस्था बालें देशों को हम लोकतान्त्रिक देश कह सकतें हंैं । आज हमारें सामनें बहोत बड़ी चुनौतिया दिखाइ दे रहा हैं ।

देश में सही लोकतन्त्र तभी हो सकता हैं जब देश के हरेक नागरिक हरेक निकाय में अपना समान सअभागिता पाया हों । विश्व भर में दर्जनों लोकतान्त्रिक परिपाटियों के देश हैं । लेकिन हरेक देश में पूर्ण रुप से लोकतन्त्र हैं ये पुरी यकिन साथ नही कह सकते । सही अर्थ में सफलता और स्थिर लोकतंत्र तब है जब सिविल सोसायटी और सरकारें एकीकृत रूप से एक लक्ष्य के लिए कार्य करें । आज लोकतन्त्र दिवस के अवसर पर हम यही कह सकतें हैं की क्या सच में नेपाल के अन्दर लोकतन्त्र जीवित हैं ?
लोकतन्त्र को जनतन्त्र ही कहते है, क्योंकि जनता के चुनाव के द्वारा ही यह तन्त्र बनता है । इसलिए बिना चुनाव का जो तन्त्र होता है । वह लोकतन्त्र या जनतन्त्र न होकर राजतन्त्र बन जाता है । इस प्रकार से लोकतन्त्र जनता का प्रतिनिधि तन्त्र है । इसमें समस्त जन समुदाय की सद्भावना और सद्विचार प्रकट होता है।

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लोकतन्त्र के अर्थ को स्पष्ट करते हुए अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन, अमेरिका के राष्ट्रपति कैनेडी, जेफर्सन, लार्ड विवरेज, विश्वविद्यालय नाटककार वर्नाड शा, महान राजनेता एवं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, प्रोफेसर लास्की, सुप्रसिद्ध अंग्रेजी विद्वान वर्क आदि ने अलग अलग विचार प्रकट किए है ं। अब्राहम लिंकन ने लोकतन्त्र का अर्थ – जनता के ही हेतु, जनता द्वारा जनता का शासन बताया है। इस प्रकार से लोकतन्त्र में लोक निष्ठा और लोक भावना का समावेश होता है। इसमें चुनाव का महत्व सर्वप्रथम और सर्वाधिक है। इससे लोक कल्याण प्रकट होता है ।

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लोकतन्त्र अर्थात् जन प्रतिनिधि एक ऐसा तंत्र है, जिसमें जनकल्याण की भावना से सभी कार्य सम्पन्न किए जाते हैं । जनकल्याण की भावना एक एक करके इस शासन तन्त्र के द्वारा हमारे सामने कार्य रूप में दिखाई पड़ने लगती है । लोकतन्त्र का महत्व इस दृष्टि से भी होता है कि लोकतन्त्र में सबकी भावनाओं का सम्मान होता है और सबको अपनी भावनाओं को स्वतन्त्र रूप से प्रकट करने का पूरा अवसर मिलता है ।

इसी प्रकार किसी भी तानाशाही का लोकतन्त्र करारा जवाब देता है । लोकतन्त्र का महत्वपूर्ण स्वरूप यह भी होता है कि इस तन्त्र में किसी प्रकार की भेद–भावना, असमानता, विषमता आदि को कोई स्थान नहीं मिलता है। इसके लिए लोकतन्त्र अपने चुनावी मुदों और वायदों के रखते हुए कमर कस करके उन्हें दूर करने की पूरी कोशिश करता है। चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ और उलझनें आ जाएँ, चुनाव की आश्वयकता इनसे अधिक बढ़ कर होती है।

लोकतन्त्र में चुनाव का महत्व इस तथ्य का प्रमाण है कि जनता का मनोभाव कुछ बदल रहा है। वह पूर्वापेक्षा यही करना चाह रहा है। इसलिए लोकतन्त्र में चुनाव का महत्व न तो कोई समय देखता है और इससे होने वाले परिणामों और कुपरिणामों पर ही विचार करता है ।

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चुनाव के बाद जहाँ चुना गया व्यक्ति जनता का प्रतिनिध होता है और आम नागरिक होता है । वहाँ वह किसी पद पर पहुँचकर असामान्य व्यक्ति बन जाता है । हम यह देखते हैं कि किसी विभाग या कार्यालय का व्यक्ति निजी अनुभव और निजी ज्ञान से कार्यों का निपटारा नहीं करता है, अपितु वह अपने सहायकों और निर्देशकों के सहारे चलकर कार्य करता है ।

लोकतन्त्र और चुनाव तो एक अच्छा एवं कल्याणकारी स्वरूप है, लेकिन इसके दुरूपयोग तो इससे कहीं भयंकर और कष्टदायक है। आज लोकतांत्रिक चुनाव का स्वरूप हर बार धुंधला और मटमैला हो जाने के कारण इससे अब किसी प्रकार के अच्छे परिणाम और सुखद भविष्य की कल्पना कठिनाई से की जा रही है । जनता तो विवश और लाचार है । वह किसका चुनाव करे और किसका न करे । वह जिसे चुनती है, वही गद्दार और शोषक बन जाता है । इसलिए वह हारकर कभी इस दल को, कभी उस दल को अपना मत देती है लेकिन फिर भी कोई अन्तर नहीं पड़ता है। अतः लोकतन्त्र के चुनाव स्वरूप में परिवर्तन होना चाहिए ।

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