रविवार से शुरु हुई जगन्नाथ यात्रा
२६ जून
भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा को लेकर मान्यता है कि वह अपने भाई-बहनों के साथ रथ पर सवार होकर मौसी के घर गुण्डीचा मंदिर में जाते हैं। हिंदू शास्त्रों के मुताबिक द्वापर युग में लीला पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण जब एक बार वृंदावन त्याग कर द्वारिका नगरी में अपनी पत्नियों संग निवास कर रहे थे। उस समय पूर्ण सूर्य ग्रहण का दुर्लभ अवसर आया। इस अवसर पर सभी यदुवंशियों ने श्री कृष्ण के नेतृत्व में कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान किया। यहां पर सभी स्नान, उपवास, दान आदि करके अपने पापों का प्रायश्चित करने गए थे। वहीं इस दौरान जब वियोगिनी राधा रानी एवं वृंदावन वासियों को श्री कृष्ण के कुरुक्षेत्र आने का पता चला तो उन्होंने नन्द बाबा के नेतृत्व में कुरुक्षेत्र जाने का निश्चय किया। जिससे कि वहां पर श्रीकृष्ण के दर्शन किए जा सकें। इस दौरान जब कई वर्षों के बाद राधा रानी तथा गोपियों ने श्री कृष्ण को देखा तो उन्हें अपार खुशी हुई। राधा रानी की नजरे श्रीकृष्ण के ऊपर से हटने का नाम नहीं ले रही थीं। राधा रानी का मन बार-बार बीते सयम की तरह एक बार श्री कृष्ण के साथ वृंदावन की कुंज गलियों में विहार तथा मिलन के लिए व्याकुल था, लेकिन कुरुक्षेत्र का वातावरण तथा श्री कृष्ण की राजसी वेशभूषा उनके प्रेम में बाधक बन रही थी। ऐसे में राधा रानी ने उन्हें वृंदावन आने का निमंत्रण दिया। भगवान श्री कृष्ण ने राधारानी का निमंत्रण प्रेम पूर्वक स्वीकार किया। इस दौरान वृंदावन वासी प्रसन्नता से झूम उठे इसके बाद रथ पर सवार होकर वृंदावन के लिए झूमते गाते-बजाते निकल पड़े। इस दौरान एक रथ पर श्री कृष्ण तथा उनके बड़े भाई बलराम तथा मध्य में बहन सुभद्रा विराजी थीं। वृंदावन वासियों ने उस रथ के घोड़ों को हटाकर खुद ही उनकी जगह रथ को संभाल लिया था। इसके अलावा वृंदावन वासियों ने परम भगवान श्री कृष्ण को जगन्नाथ यानी कि जगत के नाथ नाम दिया था। इस दौरान श्रीकृष्ण जी ने रथ खींच रहे लोगों के प्रेम को देखकर कहा कि अब तुम लोगों की जहां इच्छा हो वहां उन्हें ले चलो। जिस पर ब्रजवासी जय जयकार करते हुए उनके रथ को वृंदावन धाम तक ले गए। इसके बाद से यह जगन्नाथ रथयात्रा कृष्ण प्रेम के साथ जगन्नाथ पुरी उड़ीसा में भी निकलनी शुरू हुई। जिससे यहां की जगन्नाथ रथ यात्रा में लाखों भक्त भाग लेते हैं। आज यह उड़ीसा के अलावा देश के दूसरे राज्यों में भी निकलती है। 9 जुलाई 1967 से अमेरिका में सान फ्रांसिस्को की धरती पर भी जगन्नाथ रथयात्रा का आयोजन होने लगा था।
सभी रथ नीम की पवित्र और परिपक्व काष्ठ यानी लकड़ियों से बनाये जाते है। जिसे दारु कहते हैं। इसके लिए नीम के स्वस्थ और शुभ पेड़ की पहचान की जाती है। जिसके लिए जगन्नाथ मंदिर एक खास समिति का गठन करती है।इन रथों के निर्माण में किसी भी प्रकार के कील या कांटे या अन्य किसी धातु का प्रयोग नहीं होता है। ये रथ तीन रंगो में रंगे जाते हैं। मान्यता है कि श्रीकृष्ण जगन्नाथ जी की कला का ही एक रूप हैं। रथों के लिए काष्ठ का चयन बसंत पंचमी के दिन से शुरू होता है। उनका निर्माण अक्षय तृतीया से प्रारम्भ होता है। यात्रा के दिन प्रभु इसी पर सवारी करते हैं।जब ये तीनों रथ तैयार हो जाते हैं तब छर पहनरा नामक अनुष्ठान संपन्न किया जाता है। इसके तहत पुरी के गजपति राजा पालकी में यहां आते हैं। इन तीनों रथों की विधिवत पूजा करते हैं। सोने की झाड़ू से रथ मण्डप और रास्ते को साफ़ करते हैं।आषाढ़ माह की शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि को रथयात्रा आरम्भ होती है। ढोल, नगाड़ों, तुरही और शंखध्वनि के बीच भक्तगण इन रथों को खींचते हैं। जिन्हें रथ को खींचने का अवसर प्राप्त होता है वह महाभाग्यवान माना जाता है।
साभार दैनिक जागरण


