क्या देश की अवस्था इतनी गम्भीर है कि सेना का प्रयोग किया जारहा है ?
रणधीर चौधरी, विराटनगर, २७ जून | नेपाली सेना की शाख बचाना जरुरी
नेपाल में कल स्थानीय तह का दूसरे चरण का चुनाव है । प्रदेश १, ५ और ७ में । जिसमे प्रदेश १ और ५ में रहे अधिकतम जनता नेपाल के संबिधान का विरोध करती आयी है । राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल तो इस चुनाव को शान्तिपूर्ण तरीके से विरोध करती आ रही है । परंतु जमीन पर रहकर आकलन करने के बाद साफ पता चलता है कि चुनाव मे राजपा के कार्यकर्ताओं द्वारा किसी भी प्रकार के अवरोध की सम्भावना नही है । पर राजपा और अधिकतम मधेशी जनता इस चुनाव का नैतिक ढंग से बहिष्कार अवश्य करेगी ।
परंतु जिस तरह स्थानीय तह के चुनाव में नेपाली सेना कोे खटाया गया है इससे साफ पता चलता है कि नेपाल सरकार यह चुनाव जोरजुलम से करवाने मे लगी है । और नेपाली सेना के ऐतिहासिक शाख को गिराने का प्रयत्न कर रही है ।
ऐसा नही है कि नेपाल के संविधान मे सेना परिचालन का प्रावधान नही है । संविधान के धारा २६७ के उपधारा ६ में स्पष्ट ढंग से लिखा गया है कि “नेपाल की सार्वभौमसत्ता, भौगोलिक अखंडता या कोई भाग मे सुरक्षायुद्घ, बाह्य आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह या चरम आर्थिक विश्रृंखलता के कारण गंभीर संकट उत्पन्न होता है तो राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सिफारिस के आधार पे नेपाल सरकार, मन्त्रिपरिषद के निर्णय अनुसार राष्ट्रपतिद्घारा नेपाली सेना परिचालन की घोषणा की जाएगी”।
अब चर्चा करे चुनावी मौजुदा स्थिति की । क्या संबिधान के प्रावधान के मुताविक एक भी अवस्था है जिस के आधार पे नेपाली सेना का प्रयोग किया जा रहा है ? बिल्कुल नही । चुनाव प्रस्तावित तीन मे से किसी भी प्रदेश मे न तो सार्वभौमसत्ता, भौगोलिक अखंडता या कोई भाग मे सुरक्षायुद्घ, बाह्य आक्रमण की सम्भावना है । क्या इससे यह साबित नही होता है कि आम सीमांतकृत वर्गो के उपर सितम ढाते हुवे लाया गया संविधान का कार्यान्वयन भी उसी ढंग से किया जा रहा है । प्रदेश नम्बर १ के राजपा के युवा नेता राकेश रोशन यादव के अनुसार,‘नेपाली सेना का स्थानीय तह मे परिचालन का मतलब मधेशियो को गुलामी के जंजीर मे जकड़ कर रखने की नियति को स्पष्ट करता है जो की अब सम्भव नही है’ ।
नेपाली सेना का एक अपना गौरवपूर्ण इतिहास है विश्व में । कहा जाता है कि सन् १७४४ मे तत्कालीन गोर्खा राज्य को संगठित करने वाली नेपाली सेना मैदान मे उतरने वक्त तक दक्षिण एसिया के और देश मे सैनिक संरचना का विकास भी नही हुवा था । इस आधार मे नेपाली सेना को दक्षिण एसिया का ही सबसे पुराना सैन्य संगठन कहा जा सकता है ।
नेपाली सेना का संचालन तथा सुरुआत तत्कालीन राजा पृथ्वीनाराण शाह ने किया था नेपाल के विभिन्न राज्यो को एकीकरण करने में । जिसको आज के दिन में गोरखा राज्य का विस्तारीकरण कहा जाता है । तब के शाही सेना शाह वंश के राजा के अधीन के यात्रा से शाह वंश के ११ वीं पुस्ता के राजा ज्ञानेन्द्र शाह के समय में राजतन्त्र के अन्त के बाद से नेपाली सेना मे तबदिल होने का इतिहास है ।
स्थानीय तह के चुनाव मे परिचालित होने से सेना को खुद भी दूर रहना चाहिए था । क्योंकि यह न तो परिस्थिति की माँग है न संविधान बमोजिम ही किया गया है । हलाँकि जो स्थाई शक्ति होती है वो माहिर होती है किसी भी परिस्थिति को अपने अनुकूल बनाने में । तो संबिधान की व्याख्या भी अपने ढंग से करके लागु करने की दादागीरी भी वे कर ही सकते है ।
परंतु मधेश मे रहकर परिस्थिति को भाँपते हुवे अगर कहा जाय तो नेपाली सेना का स्थानीय चुनाव में प्रयोग करना मधेशी जनता मे उत्पन्न अलगथलग वाली भावनाओं का आयतन बढाना होगा । गौरतलव है कि राजा पृथ्वी ने नेपाली सेना का सहयोग ले कर गोरखा राज्य को विस्तार करते हुवे नेपाल को भौगोलिक हिसाब से एकरुप किया था । परंतु भावनात्मक खाई आज के दिन तक नेपाल मे कायम है । चाहै कीर्तिपुर के पीडि़त नेवार समुदाय हो या कोई राजा पृथ्वीद्वारा प्रताडि़त और समुदाय । मेरे विचार मे अभी नेपाली सेना को नेपाली जनता मे उत्पन्न अलगथलग वाली भावनाओ को कैसे हटाते हुवे नेपाल को संमृद्घि के राह पर लाया जा सकता है इस पर ध्यान देना चाहिये । आज के युग मे बन्दुक के दम पर क्षणिक अवधी के लिये लग सकता है किसी को कि वे विजेता हो गये परंतु कलान्तर मे उसका परिणाम बुरा ही होगा ।


