मधेश मुद्दों को लेकर सरकार अब भी गम्भीर नहीं
नेपाल की जनता बीस वर्षों के इंतजार के बाद स्थानीय चुनाव की प्रक्रिया से गुजर रही है । परिणाम भी अब सामने आने लगा है । परन्तु इस चुनाव को लेकर देश का एक क्षेत्र असंतुष्ट है । परिणाम यह बता रहा है कि एमाले अपनी नीति में कामयाब रही । राष्ट्रवाद का मुद्दा उठाकर वो फायदे में रही और देश को दो समुदाय में बाँटने में भी सफल रही । जबकि राष्ट्रवाद किसी व्यक्ति विशेष या समुदाय विशेष की थाती नहीं है । जहाँ तक काँग्रेस का सवाल है वह मधेशी दल को छोड कर आगे बढना चाहती थी और फायदा लेना चाहती थी पर इस नीति के साथ जिस परिणाम की उम्मीद कर रहे थे वह उन्हें नहीं मिला । काँग्रेस और माओ दोनों ही अपेक्षित परिणाम से वंचित रहे ।
दो नम्बर प्रदेश का चुनाव बाकी है । जिस तरह से सैन्य बल के सहारे दोनों चुनाव सम्पन्न हुए खास कर दस्रे चरण का चुनाव उसी तरह दो नम्बर का चुनाव भी सम्पन्न कराया जा सकता था परन्तु इसे नहीं कराये जाने के पीछे शायद काँग्रेस की तैयारी की कमी थी । चुनाव सम्पन्न हो चुका है किन्तु मधेश की माँगों को लेकर सरकार अब भी गम्भीर नहीं लग रही । तो क्या एक बार फिर राजपा नेपाल के बिना ही चुनाव कराया जाएगा । मधेश मुद्दों को अगर सम्बोधित किए बगैर सरकार आगे बढ़ती है तो यह मधेश के असंतोष को बढ़ायेगा और यही असंतोष बाँटने का काम भी करती है इस गम्भीरता को सरकार को समझना होगा नहीं तो आज जिस तरह सीके राउत मत बदर कर चुनाव का फायदा लेने की कोशिश कर रहे थे कल वो इसे हथियार भी बना सकते हैं । सरकार यह समझें कि संविधान और उसका कार्यान्वयन देश के लिए जितना आवश्यक है उतना ही मधेश भी आवश्यक है । देश के साथ ही मधेश भी है यह सच सरकार को स्वीकार करना होगा ।
