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एमाले द्वारा मैथिली, अवधी, भोजपूरी को आपस में लड़ाने की कोशिश : श्वेता दीप्ति

 

श्वेता दीप्ति , काठमांडू, १५ जुलाई | मधेश की राजनीति में एक उड़ती सी खबर फैल रही है कि राजपा एमाले का दामन थाम कर मधेश की डूबती नैया को किनारे लगाने का प्रयास कर रही है । वैसे तो यह राजनीति है जहाँ माना जाता है कि यहाँ कोई स्थाई दोस्त नहीं होता और न ही दुश्मन । अगर इस उक्ति को सही माने तो राजपा अगर एमाले का दामन थामने जा रही है तो कुछ गलत नहीं । पर क्या राजपा इससे पहले यह स्पष्ट करेगी कि इसके पीछे उनकी उम्मीदें क्या हैं ?

एमाले का मनोबल अभी उच्च तापक्रम पर है और एमाले की नीति भी स्पष्ट है कि स्थानीय चुनाव के दो चरणों के परिणाम के पश्चात् अब उसकी अर्जुन दृष्टि दो नम्बर प्रदेश पर है और वो वहाँ भी अपनी स्थिति मजबूत करना चाहेगी । जिसकी एक शुरुआत थी राजधानी में मधेशी, जी हाँ मधेशी बुद्धिजीवी (जिस मधेश शब्द को एमाले नहीं मानती) के साथ हुए कार्यक्रम । जहाँ एमाले अध्यक्ष ने एक घंटे से अधिक अपना वक्तव्य रखा पर जमात के द्वारा आए सवाल का उत्तर गुल कर गए । जो एमाले समर्थित थे उन्हें प्रश्न के लिए पूरा समय दिया गया परन्तु जो किसी अन्य सवाल करने वाले थे उन्हें पूरा प्रश्न भी नहीं करने दिया गया । जनकपुर से उनबुद्धिजीवियों को ही बुलाया गया था जो एमाले समर्थित हैं । खैर, यहाँ सवाल राजपा की नीति का है कि अगर राजपा एमाले का साथ देती है तो क्या मधेश इसे स्वीकार करेगा ? अगर तीसरे चरण के चुनाव में राजपा अपनी इस नीति के साथ गई तो इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि उनकी स्थिति फोरम जैसी ना हो जाय । यह सच है कि दो नम्बर के पास विकल्प नहीं होगा पर इसका फायदा अगर राजपा एमाले का साथ देती है तो उसे नहीं मिलने वाला यह तो तय है । राजपा अगर चुनाव में जाती है तो बेशक जाय लेकिन अपने बलबूते पर । सिर्फ समर्थन की राजनीति ना करें क्योंकि ऐसे में सिर्फ मोहरा बन कर रह जायेगें ।
एमाले की नीति अब भी कमोवेश मधेश का लेकर पहले ही की तरह है । संविधान संशोधन अभी भी उनके लिए राष्ट्रघाती ही है, भाषा के नाम पर मधेश को सुलगाने का काम एमाले अध्यक्ष शुरु कर ही चुके हैं तो ऐसे में एमाले का साथ या उसका समर्थन किस आधार पर ? यह प्रश्न मधेशी जनता जरुर करेगी । डा. बद्री विशाल पोखरेल जी का लेन्डुपहरूलाई घाँडो भएको राष्ट्रवाद नामक एक आलेख रातोपाटी में पढने को मिला जिसमें उन्होंने चर्चा की है कि राष्ट्र से, मधेश की भाषा, संस्कृति और परम्परा से प्यार करने वाले नेता, बुद्धिजीवी, साहित्यकार सभी एमाले के झंडे के तले आ रहे हैं । जिसमें कुछ नाम हैं, राजपा महामंत्री समीम मियाँ, अनिता यादव, पारोदेवी यादव, सुखाराम यादव, सुरेश सिंह, हेमशंकर सिंह, अनिल सिंह, प्रसिद्ध साहित्यकार रमेश रंजन झा, करुणा झा, आभासेतु सिंह इन नामों की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा है कि ये सभी राष्ट्रवाद के झंडे के तले आ चुके हैं

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तो क्या इनके अतिरिक्त मधेश के मुद्दों पर लड़ने वाले राष्ट्रद्रोही हैं ? क्या ये चंद व्यक्तित्व ही मधेश का निदर्शन बन सकते हैं ? क्या हिन्दी को मान्यता दिलाने की माँग करने वाले राष्ट्रद्रोही हो गए ? भाषा के नाम पर जो राजनीति मुख्य पार्टी ने शुरु की है क्या वो घातक नहीं है ? हिन्दी विरोधी खेमा चला कर जो राजनीति की जा रही है क्या वो घातक नहीं है ? क्या मैथिली, अवधी, भोजपूरी को आपस में लड़ाने की कोशिश नहीं की जा रही है ? हिन्दी को सिर्फ मान्यता देने के नाम पर इतना बवाल वहीं, दार्जिलिंग और गोरखा लैंड के सवाल पर सहानुभूति । क्या रमेश झा, करुणा झा आदि विद्वान यह बता पाएँगे कि अगर मैथिली, भोजपूरी, अवधी आदि भाषाओं का अस्तित्व खतरे में है या इनका उचित विकास नेपाल में नहीं हो पाया है तो इसमें हिन्दी की क्या भूमिका है ? अंगीकृत नागरिक को देश के सर्वोच्च पद देने या न देने का सवाल संवैधानिक है परन्तु भाषा का सवाल मौलिक अधिकार के अन्तर्गत आता है जो शिक्षा से भी सम्बन्ध रखता है । कितनी अजीब बात है भारत की बेटी स्वीकार है परन्तु कुछ मधेशियों को और देश के कर्ताधर्ता को उनकी भाषा स्वीकार्य नहीं है । अर्थात बहु लाएँ किन्तु उन्हें उनकी शिक्षा से वंचित कर दें । या फिर औरत को सिर्फ घर की चारदीवारी से जोड़कर देखना चाहते हैं इसलिए उनकी भाषा का कोई महत्व नहीं रह जाता है ? सभी जानते हैं कि कोई भी भाषा सिर्फ भाषा नहीं होती वो अभिव्यक्ति और शिक्षा का सहज माध्यम होती है और उससे ही वंचित करने की पूरी तैयारी जारी है । लोकतंत्र की बात करते हैं और भाषा पर प्रतिबन्ध लगाकर लोकतंत्र का उपहास भी उड़ाते हैं । क्या हिन्दी इतनी भयंकर अस्त्त्वि रखती है कि उसे मान्यता मिलते ही अन्य भाषाओं का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा ? या फिर अपनी भाषा के अस्तित्व पर यकीन नहीं ? आलोचना या विरोध सिर्फ इसलिए ना करें कि करना है बल्कि इसके औचित्य पर भी जरुर ध्यान दें यह अनुरोध है सभी बुद्धिजीवियों, भाषाविदों और नेताओं से, क्योंकि किसी भी देश पर वहाँ के हर छोटे बडे, नागरिक का अधिकार होता है । उनके अधिकार और अस्तित्व को बरकरार रखने की जिम्मेदारी राज्य की जितनी होती है उतनी ही बौद्धिक वर्ग की भी ।

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