जनकपुर विष्फोट का रहस्य !
पंकज दास
जहां पूरे देश में जातीय व क्षेत्रीय आधार पर अलग-अलग राज्यों के निर्माण के बारे में मांग उर्ठाई जा रही है उसी बीच में अपने प्राचीन और गौरवमयी इतिहास के लिए मिथिला

राज्य की मांग भी काफी दिनों से उठ रही है। जनकपुर के रामानन्द चौक पर हो रहे शान्तिपर्ूण्ा धरना पर््रदर्शन उसी की एक कडि थी। मिथिला राज्य की मांग को लेकर उत्साही लोगों के एक समूह ने चौक पर ही धरना देकर अपनी मांग को मनवाने के लिए दबाव दिया। इतने में ही अचानक वहां जोडदार धमाका हुआ और देखते ही देखते वहां उपस्थित कई लोगों ने मौत को काफी नजदीक से देखा। कुछ लोगों को तो अपनी जान भी गंवानी पडी। आनन फानन में इस विष्फोट की जिम्मेवारी राजन मुक्ति समूह ने ली। यह धमाका इतना शक्तिशाली था कि करीब तीन दर्जन लोग घायल हो गए, जिनमें से कुछ घायलों का इलाज अभी भी काठमाण्डू के महाराजगंज स्थित शिक्षण अस्पताल में किया जा रहा है। मरने वालों की तादाद बढकर ५ हो गई है। करीब १८ लोगों का इलाज काठमाण्डू में किया जा रहा है।
अलग प्रकृति का विष्फोट
इस विष्फोट की प्रकृति को जरा गौर से विचार करने पर इसमें छिपे कई रहस्यों पर से अपने आप ही पर्दा उठ जाएगा। मसलन विष्फोट के तुरन्त बाद राजन मुक्ति द्वारा इस विष्फोट की जिम्मेवारी लेना। कहने के लिए तो राजन मुक्ति ने जिम्मेवारी ले ली लेकिन मधेश के सशस्त्र समूहों को काफी करीब से जानने वाले लोगों का मानना है कि उनके द्वारा किए गए अब तक की सभी घटनाओं की प्रकृति इससे कहीं भी मेल नहीं खा रही थी। जनकपुर के रामानन्द चौक का विष्फोट इतना भयानक था कि घायल हुए लोगों के शरीर पर जो जख्म हुए हैं, उससे यह साफ होता है कि मधेश के नाम पर सशस्त्र संर्घष्ा करने वाले किसी भी समूह के पास वह विष्फोटक पदार्थ नहीं है जो कि जनकपुर विष्फोट में इस्तेमाल किया गया था। इसके अलावा यह विष्फोट रिमोट के जरिये कराये जाने की बात भी जांच में सामने

आई है। इससे भी साफ होता है कि सिर्फनाम कमाने के लिए या फिर किसी और के कहने पर यह जिम्मेवारी ली गई है।
राजन मुक्ति सहित मधेश के अन्य समूहों द्वारा जो भी वारदात को अंजाम दिया गया है, उसमें या तो लोगों की हत्या की गई है या फिर साँकेट और प्रेशर कूकर बम विष्फोट कराया गया है। दूसरी बात यह भी गौर करने वाली है कि मधेश के सशस्त्र समूहों द्वारा कभी भी मधेशी जनता की भीडÞ को लक्षित कर विष्फोट नहीं कराया गया है। पिछले कुछ महीनों में चलती हर्ुइ बस में भी विष्फोट की घटना की जिम्मेवारी मधेश के सशस्त्र समूहों द्वारा ली जाती रही है, उसमें भी जांच के बाद पता चला है कि वह उनके द्वारा नहीं बल्कि किसी और के द्वारा किया जाता रहा है। इसलिए राजन मुक्ति लाख दावा करे कि जनकपुर के रामानन्द चौक पर जो शक्तिशाली विष्फोट हुआ है, वह उनके समूह के द्वारा कराया गया है, यह बात विश्वसनीय नहीं लगती।
प्रशासन की मिलीभगत
जनकपुर के रामानन्द चौक पर सुरक्षा की दृष्टि से सीसीटीवी कैमरा भी लगाया गया है। और हमेशा ही यानि कि २४ घण्टे ही वह काम करता है लेकिन अचानक ऐसी कौन सी खराबी आ गई कि उस विष्फोट से कुछ ही घण्टे पहले सीसीटीवी ने काम करना बन्द कर दिया। यह कोई महज संयोग नहीं हो सकता। बल्कि इस विष्फोट को अंजाम देने के लिए ही सीसीटीवी को जानबूझकर खराब कर दिया गया होगा या फिर उसे बन्द कर दिया गया। पुलिस प्रशासन पर दूसरा शक इसलिए भी होता है कि विष्फोट के बाद वहां मौजूद सबूतों को मिटाने के लिए पुलिस की मदद से कुछ ही देर के बाद विष्फोट के स्थल को पानी से धो दिया गया। यानी कि जांच के लिए फाँरेन्सिक टीम आती और धमाके में इस्तेमाल किए गए विष्फोटक पदार्थाें के बारे में और अधिक जानकारी इकठ्ठा कर पाती, उससे पहले ही पुलिस प्रशासन ने जगह को पानी से धोकर सारे सबूतों को ही नष्ट कर दिया। धमाके की जगह को पानी से भले ही धो दिया गया हो लेकिन उस धमाके के घायल लोगों के शरीर पर जो बम के र्छरे लगे हैं, उसकी जांच के बाद यह खुलासा हुआ है कि धमाके में जिन विष्फोटकों का इस्तेमाल किया गया था वह विष्फोटक या तो नेपाल पुलिस या नेपाली सेना या फिर माओवादी के पास कैण्टोनमेण्ट ही था। कोई भी सशस्त्र समूह यह दावा करे कि यह धमाका उसने कराया है तो यकीन मानिए कि उस सशस्त्र समूह ने पुलिस या फिर सेना या फिर माओवादी के कहने पर या उनके इशारे पर यह किया है।
इस धमाके के बाद जो सबसे आर्श्चर्यजनक बात सामने आई वह थी जनकपुर के सिडिओ और एसपी की तत्परता। इतनी तत्परता तो शायद ही कहीं की पुलिस या सिडिओ के द्वारा दिखाई गई हो। उनकी इसी तत्परता की वजह से यह संदेह और भी गहरा हो गया कि कहीं इन धमाकों के पीछे पुलिस और प्रशासन की मिलीभगत तो नहीं – इस धमाके के कुछ ही देर के बाद तब तक मृत करार दे दिए गए चार लोगों को शहीद घोषणा करने के लिए सिडिओ की तरफ से काठमाण्डू स्थित गृह मंत्रालय में सिफारिश भी की जा चुकी थी। अभी शवों का पोष्टमार्टम भी नहीं हुआ था कि दस दस लाख रूपये दिए जाने की सिफारिश का फैक्स काठमाण्डू के गृह मंत्रालय में पहुचाया जा चुका था। घटना के अभी दो घण्टे भी नहीं बीते थे कि सिडिओ की तरफ से बाकायदा पत्रकारों को बुलाकर यह बयान जारी किया गया कि मृतकों को शहीद घोषणा किए जाने और उन सबको दस-दस लाख रूपये मुआवजे के रूप में देने की सिफारिश कर दी गई है। आखिर इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई – आज तक इतनी घटनाएं होती है, मधेश आन्दोलन में मारे गए कई लोगों को आज भी शहीद घोषणा करने के लिए राजनीतिक दल एंडी चोटी का जोर लगा रहे हैं, उसका किसी ना किसी रूप में विरोध हो रहा है और क्या कारण है कि जनकपुर के विष्फोट के बाद मृतकों को इतनी आसानी से बिना मांग किए और बिना किसी देरी के ही शहीद घोषणा और मुआवजे की बात भी मान ली गई। प्रशासन के सिफारिश को सरकार ने भी बिना किसी देरी के मान भी लिया। इन सभी बातों पर गौर करें तो आपके मन में शंका होना लाजिमी है कि कहीं यह सब पर्ूव निर्धारित तो नहीं था –
मधेश आन्दोलन को कमजोर करने की साजिश
जनकपुर विष्फोट को मधेश आन्दोलन को कमजोर करने की साजिश के रूप में लिया जा रहा है। मधेश आन्दोलन के बाद ही समग्र मधेश की मांग की गई। जैसे-जैसे संविधान जारी होने का दिन करीब आता जा रहा है, वैसे-वैसे मधेश के आन्दोलन के विरोध में और कमजोर करने के लिए कहीं थारू कहीं कोचिला कहीं अखण्ड सुदूर पश्चिम तो कहीं भोजपुरा की मांग की जा रही है। इसे कहीं प्रायोजित तो कहीं भावनात्मक रूप से उठाया जा रहा है। जब इतने सारे प्रदेशों की मांग हो रही है और एक मधेश एक प्रदेश पर मधेशी दलों के शर्ीष्ा नेताओं का ही बयान ही अलग-थलग आने लगा तो यह तय हो गया कि एक मधेश एक प्रदेश अब नहीं आ सकता है, तब जाकर कहीं मिथिला तो कहीं भोजपुरा की मांग उठने लगी। अपनी विज्ञप्ति में राजन मुक्ति ने मिथिला राज्य संर्घष्ा समिति पर माओवादी के मोहन वैद्य समूह द्वारा पांच करोड रूपये लेकर मधेश आन्दोलन को कमजोर करने की साजिश करने का आरोप लगाया है जो कि सरासर गलत है। अगर इसमें कोई प्रायोजित आन्दोलन है तो वह अखण्ड सुदूर पश्चिम का आन्दोलन और कुछ नेताओं द्वारा तीन थारूओं के लिए किया जा रहा आन्दोलन है। निश्चित रूप से यह दोनों आन्दोलन मधेश को कमजोर करने और विखण्डित करने के लिए किया जा रहा है। मधेश की मांग को लेकर हुए आन्दोलन में सभी ने बढÞ-चढÞ कर हिस्सा लिया, चाहे वह भोजपुरा वाले हों या फिर मिथिला वाले। थारूओं ने भी मधेश आन्दोलन के समय उसमें सहभागिता जताई लेकिन अब जिस तरीके से यूरोपीय यूनियन के डाँलर के खर्चे पर वो मधेश के अस्तित्व को नहीं स्वीकारने और पूरे मधेश को तीन थारू प्रदेशों में विभाजित करने की मांग कर रहे हैं, उससे लगता है मधेश की मांग को कमजोर करने की साजिश के तहत यह किया जा रहा है।
इतने सारे जातीय प्रदेशों की मांग के बीच अपने अस्तित्व और अपने इतिहास को बचाने के लिए मिथिला और भोजपुरा की मांग उर्ठाई जा रही है। हो सकता है कि संघीयता विरोधी लोग मधेश को कमजोर और विखण्डन करने के लिए यहां जातीय उन्माद फैलाना चाहते हैं और जनकपुर में विष्फोट की घटना उसी षड्यंत्र का एक हिस्सा है।
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