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मधेश आन्दोलन में भारत की भूमिका

तुला नारायण साह

madhesh andolan
 

नेपाली राजनीति में भारतीय दूतावास की भूमिका एक बार फिर से विवादों में घिर गई है। इस बार मधेश आन्दोलन से यह विवाद फंस गया है। वीरगंज स्थित भारतीय

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मधेश आन्दोलन में भारत की भूमिका

महावाणिज्य दूतावास के एक अधिकारी पर मधेशी नेताओं को आन्दोलन करने के लिए उक्साने का आरोप लगा है। इस पर विभिन्न दल और पक्षों की अपनी-अपनी राय है।
माओवादी के विस्तार से हताश हुए एमाले के युवा संगठन द्वारा लैनचौर पहुँच कर ही ज्ञापन पत्र सौंपा गया था। अपने जन्म के साथ ही कभी कोशी तो कभी गण्डक नदी में राष्ट्रीयता ढूंढने वाली एमाले टनकपुर तक आते-आते विभाजित भी हो गई थी। अभी इसी पार्टर्ीीे नेताओं को वीरगंज से राष्ट्रीयता पर खतरा महसूस होने लगा है। उधर माओवादी पार्टर्ीीी इस घटना की गम्भीर जांच में जुटने का दावा कर रही है। जनयुद्ध काल के समय भारत में ही रहने वाले माओवादी नेताओं को क्या उस समय की बातें याद नहीं आ रही है – जिस तरीके से इस पूरे प्रकरण में माओवादी नेताओं की जल्दबाजी वाली भूमिका रही है, वह आने वाले दिनों में उन्हीं के लिए परेशानी का सबब बन सकती है।
इस पूरे मामले में सुशील कोइराला की भी भूमिका ठीक नहीं रही। उनकी मौनता और तीन दल की बैठक में उनकी सहमति के कारण उनकी ही पार्टर्ीीे नेताओं को नागवार गुजरा है। कोइराला ने २००७ साल से लेकर हुए प्रजातांत्रिक आन्दोलन में भारतकी भूमिका के बारे में कुछ भी कहने से कभी ब्रेक नहीं लगाया था। २०४६ साल में चक्सीबारीमें तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर का जोशीला भाषण निश्चित ही सोचने पर मजबूर किया होगा। आजकल करीब करीब दैनिक रूप से होने वाली तीन दल की बैठक में किसी भी नेता ने इस बारे में चर्चा करने का दुस्साहस किया तो दिल्ली में हुए १२ सूत्रीय सहमति से लेकर अनमिन और संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायोग तक की नेपाल से वापसी तक की घटना से उन्हें लज्जास्पद होना पड सकता है। इन सभी बातों को छोड कर यदि भारत की भूमिका इन नेताओं के लिए सहयोगी या असहयोगी का विश्लेषण किया जाए तो पर्ूण्ाता पा रही शान्ति प्रक्रिया, निर्माणाधीन रही राष्ट्रीय सहमति की सरकार और विजय कुमार गच्छेदार की मुठ्ठी में रही मधेशी मोर्चा की सत्ता यात्रा के कारण और कारक को याद कर निश्चित ही सोचने पर मजबूर होना पडÞेगा।
तीन दल के नेताओं को तथा मधेशी मोर्चा को सत्ता में पहुँचाने के लिए भारत द्वारा सहयोग या असहयोग के विषय पर बहस करने से अच्छा है कि मधेश आन्दोलन के दौरान भारत का कितना सहयोग रहा है इस पर बहस की जानी चाहिए या इसको बहस का विषय बनाया जाना चाहिए।
आज कल चर्चा में रहा वीरगंज के समाचार का कई पक्ष काफी रोचक है। नेपाली राजनीति और पत्रकारिता को समझने वालों के लिए यह कोई नयां विषय नहीं है। पत्रकारिता और राजनीति सीख रही युवा पीढी की भावना पवित्र हो सकती है जिसका सम्मान हम सभी को करना ही होगा और हौसला अफजाई भी करनी होगी। लेकिन क्रान्तिकारिता की खोजी में रहे लोगों के लिए माधव कुमार नेपाल और बाबूराम भट्टर्राई के प्रधानमंत्री बनने के पीछे का कारण और कारक भी तो पता लगाना होगा। सिर्फमधेश के सर्ंदर्भ में इसकी चीर फाड होगी तो यह मधेश आन्दोलन के प्रति अन्याय होगा।
बिगत ६० वषर्ाें से मधेश ने काठमाण्डू से सिर्फतीन मांगे की हैं। संविधान में मधेशी समुदाय की पहचान, राजनीति में समानुपातिक प्रतिनिधित्व और राज्य के सभी महत्वपर्ूण्ा निकाय सुरक्षा, प्रशासन, न्यायालय और बजट बंटवारे में अर्थपर्ूण्ा सहभागिता। ये तीनों ही मांग मधेशी राजनीति की विवादरहित मांग है जो कि वास्तविक संघीयता के आने पर ही पूरी हो सकती है। इसके लिए मधेश में कई बार आन्दोलन हुआ है लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि इन आन्दोलनों में भारत ने कितना सहयोग किया है। इसका लेखाजोखा होना जरूरी है।
पंचायत काल में राजा महेन्द्र और वीरेन्द्र ने कभी भारत तो कभी चीन और कभी दोनों ही देशों के सहयोग में ३० वषर्ाें तक राज्य किया। फिर क्यूं मधेशी नागरिकों की नागरिकता की समस्या ज्यों की त्यों बनी रही – क्यों भारतीय विश्व विद्यालयों से पढ कर आए मधेशी छात्रों का स्तर निर्धारण अंक में कटौती की जाती थी – क्यों लोकसेवा में नेपाली भाषा की भार वृद्धि कर मधेशी जनता को प्रशासन में प्रवेश से अघोषित रूप से प्रतिबन्ध लगाया गया था – क्यों नेपाल के प्रहरी और सेना में मधेशी युवाओं की उपस्थिति अत्यन्त न्यून बनी रही – क्यों तत्कालीन पंचायत में मधेशी मूल के लोगों की उपस्थिति एकदम न्यून होती थी – २०४६ साल के आन्दोलन के बाद भी क्यों कांग्रेस और एमाले द्वारा शासित प्रजातांत्रिक काल में भी ये सभी समस्यां वैसी की वैसी ही बनी रही –
भारत की भूमि से जनयुद्ध लडने वाले माओवादी के साथ भारत के ही निर्देशन एवं मध्यस्थता में कांग्रेस एमाले सहित के ७ दलों ने दिल्ली में जाकर १२ सूत्रीय समझदारी की थी। बावजूद इसके क्यों मधेशी जनता को व्रि्रोह करना पडा – यदि भारतीय नेताओं या भारतीय दूतावास द्वारा मधेशी के पक्ष में वकालत की जाती है तो क्यों ६ दशकों से अधिक की उनकी संघीयता की मांग को अन्तरिम संविधान २०६३ में क्यों नहीं उल्लेख किया जाता है – यह कडवी सच्चाई है कि १२ सूत्रीय दिल्ली समझदारी के बाद भी आज तक दलों के बीच जो भी सहमति समझौता हुआ है उसमें भारत की भूमिका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रही है लेकिन फिर भी मधेश के किसी भी मांग को पूरा नहीं होने दिया जा रहा है।
इतना ही नहीं २०६३ के मधेश व्रि्रोह और २०६४ साल के मधेश आन्दोलन के बाद हुए २२ सूत्रीय और ८ सूत्रीय समझौते में भी भारत की भूमिका मधेश केन्द्रित न होकर काठमांडू सत्ता केन्द्रित ही रही है। भारतीय दूतावास में ही तैयार की गई ८ सूत्रीय समझौते में उल्लेखित सेना और संघीयता संबंधी सवाल आज कहां पहुंच गया है – माओवादी लडाकू भूमिका में अहं भूमिका निर्वाह करने वाला भारत नेपाली सेना में मधेशी जनता के प्रवेश पर हमेशा क्यों खामोश रहती है – संविधान सभा में निर्ण्ाायक शक्ति के रूप में उभरे मधेशी दलों को राष्ट्रपति निर्वाचन में अपने ही पर्ूव घोषणा के विपरीत किसने मतदान करने का दबाब डाला था – प्रधानमंत्री के पद पर माओवादी की जीत सुनिश्चित हो जाने के बाद किसने राष्ट्रपति को विपरीत ध्रुव का होना चाहिए यह कहकर फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव पर दबाब बनाकर रामराजा सिंह के विरूद्ध मतदान करवाया था – क्या यह सब किसी से छुपा हुआ है – नहीं।
रही आज की तारीख में नेपाली राजनीति में मधेश आन्दोलन की बहस की। आज मधेशी जनता को क्या चाहिए – लगभग तैयार हो चुकी सहमति समझौता के संविधान में क्या क्या समावेश किया गया है – देश के शर्ीष्ा नेताओं को अच्छी तरह से मालूम है। लेकिन संर्घष्ारत मधेश के द्वारा खोजे जा रहे अधिकार से विचलित पक्षों के द्वारा इसको आरोपित करने का प्रयास किया जा रहा है।
नए संविधान में अर्थपर्ूण्ा संघीयता की मांग को समावेश कराने की मधेश की एकमात्र इच्छा है। मधेश ऐसी संघीयता चाहता है जिसमें उसको प्रदेश में स्वशासन की प्रत्याभूति हो सके और केन्द्र के शासन में साझेदारी की अनुभूति हो सके। लेकिन जिस तरीके की संघीयता तीन दल मिल कर लाना चाह रहे हैं उससे मधेशी जनता को कोई भी फायदा नहीं हो सकता है। कांग्रेस एमाले और माओवादी द्वारा लाई जाने वाली ११ प्रदेश की राय संरचना हो या फिर शासकीय स्वरूप और निर्वाचन प्रणाली इन में से किसी से भी मधेशी जनता को बहुत कुछ नहीं मिल सकता है। इससे मधेशी समुदाय को स्वशासन और साझेदारी शासन की प्रत्याभूति नहीं हो सकती है। लेकिन फिर भी विजय कुमार गच्छदार के नेतृत्व में रही मधेशी मोर्चा का सत्ता से चिपके रहना क्या इस में भारत का दबाब नहीं है –
यथार्थ यही है कि १२ सूत्रीय सहमति से शुरू हर्ुइ कांग्रेस एमाले और माओवादी की सह यात्रा की कार्यसूची में शान्ति प्रक्रिया की पर्ूण्ाता, सहमतीय सरकार का गठन और संविधान निर्माण कार्य ही था। भारत की भी प्राथमिकता सूची में यही है। भले ही लैनचौर का नेतृत्व परिवर्तन हुआ है लेकिन भारत की कार्यसूची में कोई भी बदलाव नहीं आया है। भारत की कभी भी इच्छा यही होगी कि काठमाण्डू की सत्ता पर कब्जा करने वाले दलों पर कैसे अपना प्रभाव जमाया जा सके – और उन्हें अच्छी तरह से मालूम है कि काठमाण्डू की सत्ता पर मधेशी दल नहीं बल्कि तीन बडी पार्टियां ही बारी बारी से काबिज होती रहेगी।
नए बनने वाले सहमतीय संविधान के दस्तावेज में भी शासकीय स्वरूप पर माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड की तथा संघीयता के सवाल में कांग्रेस और एमाले की सुविधा का खास ख्याल रखा गया है। इसका प्रत्यक्ष उदहरण है ११ प्रदेश के गठन पर विजय कुमार गच्छदार और महन्थ ठाकुर की मौन स्वीकृति। राजेन्द्र महतो द्वारा इस्तीफा को जेब में ही लेकर चलना, अनिल कुमार झा द्वारा सहमति का पुतला दहन करने के बाद भी सरकार में जाने के लिए लालायित होते हुए मंत्री पद का शपथ लेना और महेन्द्र यादव तथा राजकिशोर यादव द्वारा इस्तीफे का नाम भी नहीं लेना इन सभी बातों से स्पष्ट होता है कि भारत मधेश में आन्दोलन नहीं बल्कि नेपाल में समय पर संविधान बने यह चाहता है। और इसी वजह से मधेशी दल के नेताओं को भी संविधान में ही मौन र्समर्थन देने की बात पर जोड दे रहा है। इन्हीं सब कारणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय महावाणिज्य दूतावास के अधिकारी द्वारा मधेश के आन्दोलन के लिए उकसाने की खबर में ना तो कोई सच्चाई है और ना ही भारत की इस प्रकार की कोई रणनीति है।

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