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मधेश त्राहिमाम है, आखिर किस बात का इंतजार कर रही है सरकार ? श्वेता दीप्ति

 
आज जलेश्वर, #खैराचौक मे अपने घर आगन के हैण्डपम्प से पानी लाने जारहे, विवेक ठाकुर बाढे मे दह जाने से मृत्यु हो गई है | सोर्स, चन्दन सिंह

श्वेता दीप्ति, काठमांडू | सम्पूर्ण नेपाल प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है । हर ओर त्राहि मची हुई है । पर सरकार का फास्ट ट्रैक और तराई में आन्दोलन, मेची महाकाली रैली और चुनाव के समय परिचालित होने वाली सेना अभी काम नहीं कर पा रही है । गृहमंत्रालय अभी तक निरीक्षण और निर्देशन की प्रक्रिया में ही है । फँसे हुए लोगों को कैसे निकाला जाय इस ओर कोई पहल नहीं हो पा रही है । इस वक्त हर जगह हेलिकाप्टर के जरिए युद्ध स्तर पर सहायता की आवश्यकता है । पर सरकार की अक्षमता स्पष्ट नजर आ रही है । लोग मर रहे हैं, प्रसव पीड़ा से छटपटाती महिलाओं की जान जा रही हैं, खाने पीने का सामान नहीं, सडकें टूटी हुई हैं, बिजली गुल और जनता अब सम्पर्क विहीन अवस्था में आ चुकी है । छत पर फँसे लोगों को त्रिपाल की आवश्यकता है जो मिल नहीं रही । आखिर किस बात का इंतजार कर रही है सरकार ? क्या अबतक माहोल की नाजुकता समझ नहीं आ रही ?
हालात यह है कि इस भयावह स्थिति में भी सरकार की कमी पर ध्यान ना देकर एक बार फिर से पीडि़त जनता के घाव को कुरेदते हुए उनका ध्यान भारत पर आरोप लगाकर सिर्फ कोशी बैरेज पर केन्द्रित किया जा रहा है । कई संचार माध्यम ने तो भारत पर अमानवीय हरकत करने का आरोप भी लगा दिया है । सोशल मीडिया पर भारत को दोष दिया जा रहा है । कितनी अजीब बात है कि हम अपनी सारी कमियों को कहीं और प्रत्यारोपित कर रहे हैं । कोशी बैरेज के सभी फाटक को खोलने की माँग की जा रही है । सभी फाटक एकाएक खोले नहीं जा सकते । अगर यह नादानी की गई तो यह सही है कि ज्यादा हानि भारत को होगी पर क्या इसका खामियाजा तराई के क्षेत्र को नहीं भुगतना पड़ेगा ? ५६ में से ३७ फाटक खोले जा चुके हैं । ऐसे में यह कहना कि भारत फाटक नहीं खोल रहा है क्या मुर्खता नहीं है ? अगर फाटक नहीं खोला गया और अपनी आयु को पूरा कर चुका कोशी बैरेज क्षतिग्रस्त होता है तो इसका भयंकर परिणाम भारत को ही भुगतना पड़ेगा ऐसे में फाटक नहीं खोलने की मुर्खता भारत क्यों करेगा ? क्या वह चाहेगा कि कोशी बैरेज क्षतिग्रस्त हो और पूरा बिहार उसकी चपेट में आकर तबाह हो जाय ? क्या भारत २०६५ की आपदा को भूल गया है ? नहीं कदापि नहीं बस बात सिर्फ इतनी सी है कि हम अपनी कमजोरी को देखना ही नहीं चाहते हैं । बस आरोप प्रत्यारोप में अपना समय गँवाते हैं । यह सच है कि भारत ने कोशी के कहर से बचने के लिए कोशी बैरेज को बनाया था । आज अगर उस संधि समझौते में किसी सुधार की आवश्यकता है तो उसकी पहल समय पर होनी चाहिए । पर जब आफत आती है तो सब याद आता है और उस वक्त गालियों की राजनीति होती है । वक्त पर न तो बुद्धिजीवियों की आँखें खुलती हैं और न ही राष्ट्रवादियों को याद आता है । क्योंकि बाढ तो हर साल आती है कभी कम तो कभी ज्यादा । सिर्फ सप्तरी ही नहीं तराई का हर जिला इससे फिलहाल प्रभावित है । कई पुल टूट चुके हैं, कई बाँध बह गए हैं इसमें किसका दोष है ? इसलिए हमें वक्त की नाजुकता को समझना चाहिए और अपने स्तर पर भी राहत कार्य में जुटना चाहिए ।
सरकार को इस आपदा को राष्ट्रीय आपदा घोषित करनी चाहिए और युद्ध स्तर पर राहत कार्य शुरु करना चाहिए आवश्यकता हो तो सहायता की गुहार भी लगानी चाहिए । परन्तु अतिशीघ्र क्योंकि अगले चौबीस घंटे भी खतरे से भरे हुए हैं ।

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आज जलेश्वर, #खैराचौक मे अपने घर आगन के हैण्डपम्प से पानी लाने जारहे, विवेक ठाकुर बाढे मे दह जाने से मृत्यु हो गई है | सोर्स, चन्दन सिंह

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