अरे जिनपर विपत्ति आती है उनके दिल तो ऐसे भी लोहे के हो जाते हैं : सुरभि
सुरभि, विराटनगर | अभी देश दो धारा से गुजर रहा है । एक धारा ऐसी जिसने सर्वस्व ले लिया और दूसरी ऐसी जो इस बहती (गंगा) धारा में हाथ धोने को तैयार है । मौका चाहे सुख का हो या दुख का अपने लाभ को हमेशा आगे रखना यह इस देश के नेताओं की सुक्ति वाक्य है । किसी भी हालत में इन्हें अपना फायदा दिखना चाहिए । आँख कान होते हुए भी ये अँधों बहरों की सरकार है । ओह माफ कीजिएगा सरकार को भला क्यों दोष दें हम ही कौन से चेतनशील प्राणी हैं । अब देखिए ना एक छोटा सा उदाहरण जो हमारा परिचय देती है । हम सरकार को दोष देते हैं पर सरकार तो आकर हमारे घर आँगन के नालियों को जाम नहीं करती, एक तो नालियों का व्यवस्थापन होता नहीं और अगर मेहरबानी से हो भी जाय तो हम उसे नाली के रूप से बदल कर कचड़ादान बना देते हैं ।
भले ही आज जिस बाढ ने हमारा सब निगल लिया उसके लिए हमारी यह गलती पूरी तरह जिम्मेदार ना हो पर बारिशों के दिन में हर साल जो हाल हमारा होता है जरा दिल पर हाथ रखकर सोचिए कि वो किसके कारण होता है ? हमारे देश की सरकार तो एक समय में एक ही काम करती है । या तो वो संविधान बनाने का काम करती है, या आन्दोलन में सेना परिचालन कर मौत बाँटने का काम करती है, या संविधान कार्यान्वयन के लिए चुनाव करा कर अपनी प्रभुता स्थापित करती है या अभी देर से ही सही बाढ के लिए राहत जुटाने का काम कर रही है । अब देखिए ना बाढ क्या आई इनके लिए तो बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा । संविधान संशोधन को लेकर जो थोडी सुगबुगाहट हुई थी वो फिर किसी खुले गड्ढे में चली गई है और कहीं दूर बह गई होगी । बाढ की विभिषिका ने जब विकराल रुप धारण कर लिया, तबाही ने जब सब कुछ लील लिया तब जाकर इनकी कुम्भकर्णीय नींद खुली । पर नींद का आलस तो आज तक कायम है । हाँ यह तब हल्की हो जाती है जब फायदे के नियम बनाने होते हैं तब बहुत जल्द बन जाते हैं । लोग भूख से मरें पर हे दातृसंगठन आप मत जाइए राहत लेकर वो हमारे आपदा राहतकोष में जमा कर दीजिए जब हमारा मन होगा तब बाँट देंगे आपको कष्ट करने की कोई आवश्यकता नहीं । अरे जिनपर विपत्ति आती है उनके दिल तो ऐसे भी लोहे के हो जाते हैं । उन्हें कहाँ भूख प्यास लगती है ? उनकी आँखों में तो आँसू भी नहीं आते क्योंकि वो तो पत्थर हो जाते हैं । अब देखिए ना भूकम्प पीडित तो आज भी त्रिपाल में जी रहे हैं और उन्हें कोई कष्ट है ? नहीं क्योंकि उन्हें ऐसे ही जीने की आदत हो गई है । ये भी जी लेंगे । हम जरा राहत की रकम गिन तो लें बाद में बाँट भी देंगे ।
और इस बाढ ने तो एक और कमाल कर दिया । भूकम्प आया तो राहत की रकम के साथ साथ संविधान भी लेकर आया और बाढ आई तो अपने साथ आगामी चुनाव के प्रचार का माहोल भी ले आई और राहत सामग्री बाँटने के साथ ही सेल्फी खिंचाने का अवसर भी और अपने साथ बहा ले गई राजपा के संकल्प को और इसी के साथ शायद उन्हें याद आया होगा कि मधेश हित में उन्हें चुनाव में जाना चाहिए । अरे भाई इतनी तबाही हुई है गाँवों और शहरों में उसके लिए इनके मेयर उपमेयर होंगे तभी तो मधेश का पुनर्निर्माण हो सकेगा । जय हो आपकी दूरदर्शिता का । लगे रहिए सभी महानुभाव । हे इश्वर सबका कल्याण करना पर हाँ शुरुआत हमसे ही करना यह नीति वाक्य हमारे प्रतिनिधियों को समर्पित । (व्यंग्य)


