बुजुर्गों के प्रति श्रद्धा और सम्मान भाव रखना सबसे बड़ा तर्पण : मधु सिंह
मधु सिंह
हमें सदैव ही अपने बुजुर्गों के प्रति श्रद्धा और सम्मान भाव रखना चाहिए वो भी तब जब वो जीवित हों । और हमारी समझ से एक जिन्दा इंसान जितना आर्शिबाद और दुआएँ ,एक छोटे से श्रद्धा और सम्मान देने के बाद देगा उतना वो मरने के बाद कभी नहीं देगा, चाहे हम कितना भी श्राद्ध, पिंडदान, या तर्पण क्यों न कर लें, वो आर्शिबाद आपको कभी नहीं प्राप्त होगा जितना कि वे आपके पिताजी, दादाजी, या माताजी के रूप में देगें क्योंकि मरणोपरान्त हमारी आत्मा जो कि सदियों से किसी न किसी शरीर को धारण करते हुए आ रही है वो तो फिर से किसी दूसरे शरीर में समाहित हो जाएगी और तब वे न तो हमारे माता–पिता रहेगें और न ही हम उनकी संंतान होगें । तो फिर ऐसी धर्मान्धता और ऐसे कर्मकाण्ड का क्या फायदा ।
जैसा कि विभिन्न धर्मशास्त्रों से हमें यह ज्ञात होता है कि ईश्वर ने हम सभी को मरणोपरान्त अपने कर्मों के अनुसार पुनः शरीर तो देता है परन्तु पिछले जन्म की स्मरणशक्ति छीन लेता है । यहाँ गौर करने लायक बात यह है कि अब जबकि हम उन आत्माओं के स्मरण में रहे ही नहीं तो वे हमें किस हिसाब से आर्शिबाद देगें । इसलिए हमसभी की कोशिश यह होनी चाहिए कि यथासंंंभव अपने बुजुर्गों को समय और सम्मान दें, यही उनके लिए सच्ची शान्ति है, तब उनके द्वारा दिया हुआ आर्शिबाद हमारे लिए दुगुना फलदायी हो जाएगा ।
परन्तु हमारी मानसिकता ऐसी हो चुकी है कि हमारे बुजुर्गों के मरने पर हम लाखों लाख खर्च करते हंै ताकि समाज में हमारी प्रतिष्ठा बढ़े, फिर पितृपक्ष आते ही हरिद्वार, गया न जाने कहाँ कहाँ जाकर पिंडदान करते हैं, तर्पण करते हैं और आश्चर्य इन सभी चीजोें के लिए व्यक्ति किसी भी तरह धन और समय उपलब्ध करा ही लेता है परन्तु उनके जीवनकाल में उनके पास बैठने के लिए भी हमारे पास समय नहीं होता है कुछ लोग तो यह भी सोचते हैं कि पैसा देकर ही सारे फर्ज और कर्तव्य पूरे कर लेगें ,जबकि ऐसा नहीं है, यदि उन्हें पैसा नहीं दें तो उन्हें उतनी तकलीफ नहीं होगी जितनी कि उनको सम्मान, समय या श्रद्धा न देने पर होगी ।
जहाँ तक मेरा विचार है हर नर में नारायण है और हर नारी लक्ष्मी अवतार है, यदि उन्हें जीते जी श्रद्धा और सम्मान प्रदान किया जाए इससे ज्यादा उत्तम कोई धर्म नहीं । यहाँ एक बात स्पष्ट करना अनिवार्य है कि गरुड पुराण में कर्मकाण्डों के विषय में जो भी बातें कहीं गई हैं उस पर मैं एक बात जरुर कहना चाहूँगी कि जब समय बदल रहा है युग बदल गया ,हमारी सोच बदल रही है तो फिर पाखण्डों, ढकोसलों, अंधविश्वासों तथा बिभिन्न प्रकार के कर्मकाण्डों को भी हल्का करना चाहिए । वैसे भी कलियुग के विषय में कहा जाता है कि कलियुग केवल नाम अधारा, अर्थात श्रद्धापूर्वक ईश्वर का नाम लेकर अपने कर्मों को किया जाए सबसे बडा धर्म वही है । इन दिनों पितृपक्ष चल रहा है जहाँ देखो लोग पिंडदान, तर्पण, और श्राद्ध कर रहे हैं उनके दिल में अपने बुजुर्गों के लिए श्रद्धा भाव हो न होे लेकिन आत्मा शान्ति के नाम पर कई तरह के धार्मिक कर्मकाण्ड करते हैं । अतः मेरी उन सभी लोगों से बस एक ही अनुरोध है कि अपने बुुजुर्गों के जीवनकाल में ही उनकी जरुरतें पूरी करें । बास्तव में यही सच्चा धर्म और कर्म है ।

