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तीन साल की तृष्णा बनी जीवित कुवाँरी

 

२८ सितम्बर

 

तीन साल की बच्ची को नई कुंवारी का दर्जा दिया गया है और अब उसकी प्राचीन संस्कृति के मुताबिक पूजा की जाएगी। पुरानी कुंवारी के किशाेरावस्था में प्रवेश करने के बाद तृष्णा का चुना गया है ।

तृष्णा को कुंवारी का दर्जा
लाल वस्त्र में तृष्णा को उसके घर से ऐतिहासिक दरबार स्क्वायर ले जाया गया, जहां पर छोटे समारोह के बाद उसकी देवी के तौर पर पूजा की गई। तृष्णा के पिता उसे दरबार स्क्वायर के कुंवारी पैलेस तक लेकर आए, जहां 2015 में आए विनाशकारी भूकंप के निशान अब तक मौजूद हैं। वहां पर तृष्णा की देखभाल के लिए विशेष तौर पर गार्जियन की नियुक्ति गई है। तृष्णा का चुनाव चार उम्मीदवारों में से किया गया।

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जीवित देवी का दर्जा मिलने के बाद तृष्णा शाक्या अपने पूर्ववर्ती की तरह अपने घर को साल में केवल तेरह बार ही छोड़कर विशेष दावत दिवस के मौके पर जा पाएंगी। तृष्णा, नेवार समुदाय से आती हैं और काठमांडू वैली में रहती हैं। अपने परिवार से किनारा करने और छोटी चाल के साथ तृष्णा आम लड़की के रूप में आखिरी बार दिखीं। अब अगले 13 साल तक वह देवी के रूप में ही सार्वजनिक तौर पर नजर आएंगी।

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कुंवारी को माना जाता है देवी तलेजु का अवतार

कुंवारी के रूप में शाक्या को हिन्दू देवी तलेजु का अवतार माना जाता है और उन्हें साल में सिर्फ तेरह बार विशेष दावत पर मंदिर छोड़ने की इजाजत होती है। जीवित देवी के तौर पर तृष्णा को कुंवारी का दर्जा देने को लेकर उनकी मौजूदगी में आधी रात को हिन्दू पुजारी जानवर की बलि देंगे।

जानवरों की चढ़ाई जाती है बलि

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यहां पर ऐतिहासिक तौर पर 108 भैंस, बकरा, मुर्गा, बत्तख की परंपरा के मुताबिक बलि दी गई है। लेकिन, एनिमल राइट एक्टिविस्ट्स के भारी दबाव के चलते अब कुछ ही जानवरों की यहां पर बलि दी जाती है। ये परंपरा नेपाल के राजघराने से जुड़ी रही है, लेकिन साल 2008 में नेपाल से हिंदू राजशाही खत्म होने के बावजूद ये परंपरा जारी है।

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