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आने वाले दिन बेहद मुश्किल भरे हो सकते हैं, यह दूसरा स्लोडाउन ज्यादा लंबा और गहरा हो सकता ह

 

नई दिल्ली।।  भारत और दुनिया फिर से स्लोडाउन की तरफ फिसल रहे हैं। आने वाले दिन हमारे लिए बेहद मुश्किल भरे हो सकते हैं, क्योंकि यह दूसरा स्लोडाउन ज्यादा लंबा और गहरा हो सकता है। फिर यह नौबत ऐसे वक्त आ रही है, जब भारत का हिसाब बुरी तरह गड़बड़ाया हुआ है। तरक्की की रफ्तार थम रही है, सरकार कमजोर दिख रही है, बजट बिगड़ा हुआ है, बाहरी निवेशक भाग रहे हैं और बिजनेस की उम्मीदें टूट रही हैं। सभी एक्सपर्ट मान रहे हैं कि यह हमारी अपनी गलतियों का भी नतीजा है, जिसके लिए दुनिया की खराब हवाओं को कसूरवार नहीं ठहराया जाना चाहिए।  संजय खाती  की रिपोर्ट  :

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जीडीपी ग्रोथ रेट
5.3 पर्सेंट रही जीडीपी की ग्रोथ रेट जनवरी से मार्च के बीच। यह पिछले 9 साल में सबसे खराब है। मैन्युफैक्चरिंग की ग्रोथ रेट माइनस 0.5 रही, जो पिछले 14 साल में सबसे बुरी है।

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महंगाई
10 पर्सेंट के आसपास है महंगाई। इसकी वजह चीजों की कमी और बढ़ता उपभोग ही नहीं है। सरकार की तरफ से सपोर्ट प्राइस में बढ़ोतरी ने भी महंगाई पैदा की है। अनाज की सरकारी कीमतें बाजार से ऊपर चली गई हैं। गिरते रुपये और दूसरी वजहों से भी कच्चे माल की कीमत चढ़ी है।

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नतीजा:  इंटरेस्ट रेट घट नहीं पा रहे हैं। कर्ज की लागत ऊंची रहने से हर इकनॉमिक गतिविधि पर बुरा असर पड़ा है।

ट्रेड डिफिसिट
262 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है व्यापार घाटा इस साल। यह जीडीपी के 9 पर्सेंट तक हो गया है। तेल के अलावा गोल्ड के इंपोर्ट ने इस घाटे को बढ़ाया है। सरकार इस असंतुलन को खत्म करने में नाकाम रही है।

बजट घाटा
5.9 पर्सेंट है बजट घाटा। यह सोशल सेक्टर पर भारी खर्च का नतीजा है। इसे जीडीपी ग्रोथ और टैक्स के जरिए घटाने की कोशिशें नाकाम रही हैं, क्योंकि जीडीपी ग्रोथ रेट घट गई है और सरकारी रेवेन्यू बढ़ने के चांस भी। घाटे की भरपाई सरकार और कर्ज लेकर या नोट छापकर करती है, जिससे मनी सप्लाई कम होने लगती है और इंटरेस्ट रेट चढ़ जाते हैं। अब दिक्कत ये है कि स्लोडाउन के बीच अगर सरकार खर्च घटाती है तो उससे इकॉनमी और भी कमजोर होने लगती है।नवभारत टाइम्स

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