कुछ कमी सी है
पूजा गुप्ता
जाने क्यों सब कुछ पा कर भी इक कमी सी है,
होंठ भले ही हँसते हो मेरे
पर आँखों में नमी सी है,
ना कुछ पाने से खुशी होती है अब,
ना कुछ खोने से गÞम होता है,
किसी के जाने से,
जाने क्यों,मेरी दुनिया थमी सी है !
बहारें हैं, फिजाएँ हंै,
गुले–गुलेशन है मेरे चारो तरफÞ छाया,
पिÞmर किस बात पर मेरे अब्बसार से अश्क झलक आया,
रिश्तों का मेला है मेरे आँगन में,
पिÞmर मुझे ये दुनिया क्यों लगता इतनी सुनी–सुनी सी है ।
सब कुछ पा कर भी क्यों लगता है कुछ कमी सी है ?


