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खुलामञ्च पर २२ दलों का रुग्न रोदन

 

खुलामञ्च पर २२ दलों का रुग्न रोदन,हिन्दी का विरोध केवल राजनैतिक, जिस नेता को जरुरी परता है वह हिन्दी का प्रयोग अपने पक्ष मे करता है ।

जी हाँ , एक समय था जब सत्ता रुपी सिहाँसन पर कांग्रेस और एमाले के नेता गण विराजमान रहा करते थे और टूडिखेल के मैदान मे विभीन्न छोटे-छोटे दलों का उनके खिलाफ विरोध सभा हुआ करता था । लेकिन आज स्थिति ने करवट ली और बहुप्रचारित २२दलों की आम सभा मे ५-५ पुर्व प्रधानमन्त्रीयों के साथ – साथ अन्य नेताओं का  भी  टुडिखेल के  उसी  मन्च से उसी प्रकार का स्वर सुनने को मिला जो कि पहले उनके खिलाफ के विरोध सभाओं मे सुनाइ परता था । लेकिन इसबार थोडा सा फरक जरुर था नेतागण अशलिल शब्दों का प्रयोग नही करके नये रचे हुए सब्दों का इस्तमाल करते हुए सभ्यभाषा मे गालियों का बौछार से सत्ताधारी माओवादी और मधेशी नेताओं को आभुषित कर के उन्हे सिहाँसन छोरने के लिए ललकार रहे थे । निशचित रुप से इन नेताओं को ए गालियाँ जरुर अच्छी लगरही होगी कयोंकि गालियाँ देनेवाले ऐसे लोग थे जो कि कभी इसको एक कान से सुनते थे और दुसरी कान से निकाल देते थे । हाँ इसी मन्च पर कभी हिन्दी मे बोलने पर हुटिगं हुआ करता था वह कल्ह भी हुआ देवेन्द्र मिश्रा के वोलने पर लोगों ने हुटिगं करना शुरु किया तो रामचन्द्र पोडेल के हस्तक्षेप करने पर लोगों ने बात मान ली और उन्हे हिन्दी मे बोलने दिया गया । यह इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी का विरोध यहाँ केवल राजनैतिक है जिस नेता को जिस बक्त जरुरी परता है वह हिन्दी का प्रयोग अपने पक्ष मे करता है ।

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खुलामञ्च पर जमा हुये नेताओं का र्गजन बाबुराम भट्टराई की सरकार को सत्ता से हटाने तक ही सिमित था । लगभग सभी नेता एक स्वर मे भट्टराई सरकार व्दारा हुइ चुनाव की घोषणा को असंवैधानिक कह कर उन से इस्तिफा माँग रहे थे । वक्ताओं का कहना था कि अनिश्चित माहौल को शुनिश्चित करने का एक मात्र उपाय है प्रधानमन्त्री का इस्तिफा। अपने लक्षेदार भाषण मे के पी ओली ने माओवादी को अब कभी नही सुधरने वाला पार्टी वताया । एमाले के वरिष्ठ नेता माधवकुमार नेपाल ने माओवादी को नेपाल  माता के धुन्धुकारी सन्तान बताया । उन्होने कहा कि ‘माओवादी नेपाल माता के धुन्धुकारी सन्तान है, जो कि जन्म से ही  दुःख तकलिफ दे रहा है ’ ।

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माओवादी और मधेसी मोर्चा भादो के भेलः झलनाथ

आमसभा को सम्बोधित करते हुये एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल ने कहा  कि ‘ माओवादी और मधेसी मोर्चा भादो महिना मे पानी मे आनेवाले उफान (भेल)  की तरह है  -भादो मे पानी के उफान (भेल) कभी-कभी बहुत बरा दिखता है जिसे तैर कर पार नही किया जा सकता लेकिन वह कुछ क्षण मे ही समाप्त हो जाता है । ये दोनो पार्टी लगभग ऐसा ही है अपने आप समाप्त हो जायेगा । सभा मे मधेशी नेताओ की उपस्थिति न्यून थी। वक्ता मे भी किसी र्पाटी से कोई भी मधेशी नेताओ को बोलने का मौका नही दिया गया जिससे साफ लग रहा था की इन र्पाटीयों मे मधेशीयों का वोलवाला अब खत्म हो गया है।

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