नेपाल भारत सम्बन्धः आपसी विश्वास पर ही निर्भर होगा : बाबुराम पौडेल
भारतीय विदेशमंत्री सुषमा स्वराज फरवरी माह के आरम्भ में जब अचानक काठमाण्डौ स्थित त्रिभुवन अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरीं तो नेपाल के राजनीति और सरकारी हलकों में सनसनी सी फैल गयी । भारत की हाईप्रोफाईल अतिथि के अनौपचारिक आगमन पर सब से बडी असमंजसता नेपाल के परराष्ट्र मंत्रालय में था । सुषमा स्वराज का इस तरह नेपाल आना वर्तमान देउवा सरकार और नेपाली कांग्रेस के प्रति दिल्ली की उपेक्षा की ओर संकेत करता है । दिल्ली की नजर में भले ही इस समय कंग्रेस की उपयोगिता समाप्त हो गयी है परन्तु नेपालीे परराष्ट्र मन्त्रालय को दरकिनार करते हुये बरिष्ट नेपाली नेताओं के साथ स्वराज की मुलाकात प्रोटोकल के हिसाव से बिल्कुल ही उचित नहीं था । इसपर हमारे नेतागण और स्वयं अतिथि ने कोई महत्व ही नहीं दिया । उनका नेपाल भ्रमण विदेश मंत्री के रूप से कहीं अधिक भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विशेष दूत के रूप में सम्पन्न हुवा । उन्होने विमानस्थल पर उतरते ही अपनी यात्रा को किसी एजेण्डों से बाहर एक सद्भावना भ्रमण बताया । दिल्ली अबतक नेपाल को अपने कूटनीतिक नोकरशाह और एजेन्सियों के आंखो से देखता आरहा है । नतीजा यह था कि नेपाल भारत सम्बन्ध को कई बार तनाव भरे दौर से गुजरना पडा । इसबार एक जिम्मेदार राजनीतिक नेता और विदेशमंत्री को नेपाल भेजकर भारत, नेपाल के लिए नई और सकारात्मक संदेश देने का इच्छुक प्रतीत होता है ।
प्रधानमंत्री के सद्भावना दूत के रूप में सुषमा स्वराज का नेपाल भ्रमण एक महत्वपूर्ण समय में हुआ है । सरकार परिवर्तन के पूर्वसंध्या का समय किसी विदेशी दूत का भ्रमण उचित नहीं माना जाता है । इस वक्त भारत के हाईप्रोफाइल नेता का नेपाल आना विषय की महत्ता को दर्शाता है । उनके साथ विदेश सचिव, विदेशमंत्रालय के प्रवक्ता और नेपाल डेक्स के कुछ कर्मचारी भी आये । टीम को देखकर भी अनुमान लगाया जा सकता है कि सुषमा स्वराज किसी खास मकसद को लेकर तैयारी के साथ नेपाल आई है ।
नेपाल का संघीय गणतान्त्रिक संविधान के प्रति भारत शुरु से ही असंतुष्ट रहा है । इस असन्तुष्टि पर उसने अभी तक औपचारिक रूप से दुबारा कुछ नहीं कहा है । उसी संविधान के मुताविक स्थानीय, प्रादेशिक और संघीय चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं । चुनावों में भारत के नजदीक रिश्तोंवाली नेपाली कांग्रेस और उसकी साथवाली पार्टियों की अपेक्षा नेपाली कांग्रेस का साथ छोडकर नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी एकीकृत माक्र्सवादी लेनिनवादी के साथ चुनावी सहकार्य कर रहे माओवादी केन्द्र सम्मिलित बाम गठबन्धन को भारी सफलता मिली है ।
संविधान घोषणा के दो दिन पूर्व मोदी सरकार ने विदेश सचिव एस जयशंकर को नेपाल भेजकर संविधान पर अपनी नाराजगी जतायी थी । उस समय भारत चाहता था कि तराई के अल्पसंख्यक और पिछडों की मांगों को संविधान में संबोधन किया जाए । नेपाल के प्रमुख दल के नेताओं ने भारत की पेशकश को आन्तरिक मसले पर विदेशी हस्तक्षेप मानते हुये इन्कार कर दिया था और संविधान की घोषणा कर दिया था । उसके बादवाले दिनों में दोनो देशों के सम्बन्धों में तनाव उत्पन्न हो गया था । इसी दौरान भारत ने नेपाल पर पेट्रोलियम, गैस और अन्य अत्यावश्यक सामान निर्यात पर रोक लगा दी थी । नेपाल के राजनीतिक परिवर्तनों में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । ससस्त्र संघर्ष कर रहे माओवादी को राजनीति के मूलधार में लाने में भी भारत का महत्वपूर्ण योगदान रहा है । इसी वजह से दिल्ली नेपाल में अपने लिए स्पेश चाहता था । महीनों तक चली नाकाबन्दी से भी काठमाण्डो की सत्ता को ठिकाने न लगा पाना दिल्ली के लिए प्रत्यूत्पादक सावित हो गया । जिसके चलते नेपाल में भारत विरोधी भावना ने और जोर पकडा । इसी सेंटीमेंन्ट के बल पर चुनाव में चीन के करीब माने जानेवाले केपी ओली के नेतृत्व में बाम गठबन्धन को चुनावी सफलता मिली है । पिछलीवार केपी ओली के प्रधानमंत्रीत्व काल में ही चीन के साथ ओबीआर के तहत महत्वपूर्ण समझदारियाें पर हस्ताक्षर की गयी थी । इसका साफ मतलव यही था कि नेपाल में अब भारत के स्थान पर चीन का प्रभाव बढने जा रहा है । नेपाल को लेकर जयशंकर मिशन का असफल होना और नेपाल को बेईजिङ के समीपं जाने के लिए विवश कर देना दिल्ली की नेपाल नीति का असफल होना भी है । भारत उत्तर में हिमालय को अपनी सुरक्षा सीमा मानता आरहा है । इस स्थिति में अपने परम्परागत प्रभाववाले नेपाल में हिमालय को लांघकर चीनी प्रभाव का बढना भारत के लिए सहज बात हो ही नहीं सकती थी । दिल्ली तराई के अल्पसंख्यकाें के नाम पर रखे गये अपने अडान को भी सुखद अंजाम नहीं दे पाया बल्कि उनके संघर्ष को मझधार में छोड दिया था । यह नैया अबतक भी किनारे पर नहीं पहुंच पायी है ।
यह संयोग ही है कि तत्कालीन विदेश सचिव एस जयशंकर सेवा से अवकाश ले चुके है.। नेहरुकालीन नेपाल नीति के पक्षधर कतिपय नोकरशाह अब अपने बदलती सोच की बात करने लगे हैं । विगत में स्वयं स्वराज विदेश मंत्री के रूप में नेपाल पर नाकाबन्दी की तरफदार रहीं है । दिल्ली ने नेपाल के खिलाफ युरोपियन यूनियन बृटेन जैसे देशों को साथ लेकर अन्तरराष्ट्रीय मुहिम चलाने का प्रयास भी किया । भारत कभी नेपाल के मामले में किसी तीसरे पक्ष की उपस्थिति नहीं चाहता था । परन्तु तब उसने इस परम्परा को तोड दिया था । विगत की इस कडवे यथार्थ के बीच इसबार सद्भाव का मिठास भरा संदेश और मुस्कुराते चेहरे के साथ काठमाण्डौ उतरी स्वराज को देख कर लोगों को सचमुच विश्वास करना भी मुश्किल हो गया ।
ओबीओआर की महत्वाकांक्षी योजना पर चीन की सक्रियता भारत के पास पडोस में भी निरन्तर बढ रही है । चीन की ओबीओआर योजना के प्रति भारत और अमरिका शुरु से ही सशंकित है । दूसरी ओर दोक्लाम और भारत चीन सीमा विवाद पर भी मनमुटाव चलरहा है । भारतीय सेना के प्रमुख विभिन्न मंचो से चीन से मुकाबला के लिए तैयार रहने की बात करते हुए पडोसियों के साथ सम्बन्धों पर ध्यान रखने की बात पर जोर दे रहे है । सेना के मुखिया की इस तरह की बयानबाजी सामरिक तनाव की गम्भिरता की ओर इशारा करता है । प्रधानमंत्री मोदी भी फिर से पडोसियों के साथ सम्बन्ध सुधारने की बात करने लगे हैं । पिछले दिनो दाभोस मे प्रधानमंत्री मोदी ने इसीतरह की बात कही है ।ं उन्होने नेपाल में बाम गठबन्धन के नेता तथा संभावित प्रधानमंत्री केपी ओली को दो दो बार फोन पर साथ काम करने की मंशा प्रगट किया है ।
चन्द महीने पहले तक केपी ओली को काठमाण्डौ के सत्ता गलियारे से बाहर रखने के लिए प्रयत्नशील दिल्ली की सोच में अचानक आए यू टर्न एक साथ आशा और संदेह को भी जन्म देता है । इन परिस्थितियों में सुषमा स्वराज का नेपाल भ्रमण अर्थपूर्ण है । नेपाल में अक्सर भारत को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है । भारत पर आरोप है कि वह नेपाल में छोटे बडे मसलों पर दबाव और हस्तक्षेपकारी सोच रखता है । उस पर लगे आरोपों की सीमा को सुषमा स्वराज का भ्रमण किस हद तक हटा सकता है या फिर यह सक्रियता किसी गलत मनसूबे के लिए खेला गया सुन्दर प्रारूप है अभी कुछ कह पाना मुश्किल है । जब प्रधानमंत्री मोदी पहली बार नेपाल भ्रमण पर आये थे तब उनकोे पुरे नेपाल से रेकार्ड तोड प्रशंसा मिली थी । तब नेपाल में नेपाल भारत संबन्धं की राह में एक महत्वपूर्ण माइलस्टोन और नेपाल के सच्चे मित्र के रूप में मोदी को देखा गया था । प्रशंसा के उस शीशमहल को ढह जाने में साल भर भी नहीं लगा । नाकाबन्दी के कारण वही मोदी नेपाल के लिए खलनायक बन गए थे । सुषमा स्वराज के नेपाल दौरे को भी तत्काल शायद ही संदेह से बाहर रखा जा सकेगा ।
सुषमा स्वराज ने नेपाल में रहते हुये नेकपा एमाले के अध्यक्ष तथा चुनाव में बहुमत प्राप्त बामगठबन्धन के नेता केपी ओली को विशेष महत्व दिया । एक संभावित प्रधानमंत्री को भारत की ओर इसकदर महत्व देना उचित था ? इस कार्य से एमाले और बाम गठबन्धन के भीतर ही सवाल खडे किये जा रहे है । ओली की वर्तमान लोकप्रिय छवि धूमिल बनने की संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता । कई लोग ओली और सुषमा स्वराज के बीच की एकान्त वार्ता मे भारतीय प्रस्ताव रखे जाने की संभावना देखते हैं । इस पर औपचारिक रूप से पुष्टि नहीं हो पायी है ।
तमाम संभावनाओं के बावजूद नेपाल को भारत के साथ संबन्धों को सुमधुर बनाए रखनें के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है । जब जब नेपाल ने अपने को स्वतन्त्र राष्ट्र होने का अहसास किया है तब भारत के साथ सम्बन्धो में समस्याऐं खडी हो गयी है । इसके अलावा नेपाल और भारत के बीच लम्बे अरसे से सीमा विवाद जैसे कई समस्याऐं है उनको समाधान करना आवश्यक हैं । नेपाल और भारत सम्बन्धों के बीच में चीन को नहीं लाना चाहिए और नेपाल चीन के बीच में भारत को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए । आपसी मित्रता के जरिए कठिन से कठिन समस्या को भी सुलझाया जा सकता है । बस दिल चाहिए जिसमें विश्वास हों ।

