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मिथिलेश आदित्य

चल रहा हूँ मैं अकेले जिन्दगी की राह में,
जैसे कोई डूबता हो खुद अपनी आह में ।

क्या मनाऊँ मैं खुशी आजादी ए गुलशन की,
अब कोई आशा नहीं बाकी दिले आगाह में ।

मैं तलब करता नहीं और कुछ इसके सिवा,
जिन्दगी गुजरे हमारी बस तुम्हारी चाह में ।

जालिमों को तरस क्या आये हमारे हाल पर,
रहम का जज्बा नहीं होता दिले बदख्वाह में ।

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बादलों की रंगत है हर मोड़ पर एक जैसी,
ढ़ककर आदित्य को बरस जाता है वाह में ।

बिराटनगर, मोरंग, नेपाल

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