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एक ख्वाहिश : अयोध्यानाथ चौधरी

 

अयोध्यानाथ चौधरी

मेरी ख्वाहिश है तुझे छू लूँ मैं
पर मयस्सर तो नहीं
मेरी नजरें तो तेरे पीछे है
तुम जहाँ जाओ वहीं ।

तुम तो फरिश्ता हो, आसमाँ से टूट आयी हो
देखनेवालों ने न देखा ऐसा रूप कहीं
मेरी ख्वाहिश है तुझे छू लूँ मैं पर मयस्सर तो नहीं ।

तुम तो सरिता की झिलमिल चाँदी हो
सब्र से देख लूँ , एक ही पल रुको तो सही
मेरी ख्वाहिश है तुझे छू लूँ मैं पर मयस्सर तो नहीं ।

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पंखुरी गुलाब से गर छू सकूँ तुझको
तेरी मुस्कान बिखेरेगी जादू अनकही
मेरी ख्वाहिश है तुझे छू लूँ मैं पर मुयस्सर तो नहीं ।

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