गजल
आरती आलोक वर्मा
खुशी धड़कनों को हवा कर रही है
तेरी आरजू की दुआ कर रही है ।।
ये दुनिया भी क्या खूब है जख्म देकर
वही जख्म की अब दवा कर रही है ।।
हवा मेरे दर पे आती नहीं है
महज वहशतों से वफा कर रही है ।।
ये मिलती नहीं है कभी आइने से
हमारी ये सूरत जुदा कर रही है ।।
कहां आरती पांव आगे बढ़ाये
झिझक खÞ्वाहिशों की दगा कर रही है ।।


