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कहानी मुक्तिनाथ की

 

आज से करीब दो अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी पर सृष्टि की शुरुआत हुई थी। साथ ही करीब 10 करोड़ वर्ष पूर्व क्षीर सागर जब उठकर हिमालय बना था, उसके बाद करीब तीन करोड़ वर्ष सरिसृप युग रहा था और उसके बाद विश्व ब्रह्माण्ड में सभ्यता की शुरुआत जम्बूद्वीप के आर्यावर्त से हुई थी।

पृथ्वी सात द्वीपों में विभाजीत। उस में सर्व प्रथम मानव सभ्यता का विकास सरीसृप युग के बाद जम्बूद्वीप में हुआ। उस जम्बूद्वीप में चार क्षेत्र, चार धाम, सप्तपुरी आदि का वर्णन मिलता है। उस क्षेत्र में प्रमुख क्षेत्र मुक्ति क्षेत्र हिमवत खण्ड हिमालय नेपाल में पड़ता है।  नेपाल के पूर्व दिशा में वराह क्षेत्र नेपाल से बहने वाली गण्डकी नारायणी और गंगा के संगम में हरिहर क्षेत्र और विश्व प्रसिद्ध कुरुक्षेत्र भारत में पड़ता है।

शाण्डिल्य ऋषि द्वारा संरक्षित गण्डकी नदियों में प्रमुख काली गण्डकी में अवस्थित शालग्राम पर्वत और दामोदर कुंड के बीच भाग में त्रिदेवों में एक ब्रह्मा ने मुक्तिक्षेत्र में यज्ञ किया था। उस यज्ञ के प्रभाव से अग्नि ज्वाला रूप में रुद्र भगवान शिव और शीतल जल के रूप में भगवान नारायण विष्णु उत्पन्न हुए थे। इसी से सर्व पाप विनाशिनी मुक्तिक्षेत्र का प्रादुर्भाव हुआ था और उस में सती वृंदा के शाप से शिला रूप होने का जो शाप भगवान विष्णु को मिला था उस शाप से मुक्ति के लिए शालग्राम शिला के रूप में उत्पन्न हुए थे। इसलिए इस क्षेत्र का नाम मुक्तिक्षेत्र हुआ।

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श्री भगवान मुक्तिनाथ एवं मुक्तिक्षेत्र की महत्ता पूजा अर्चना वैदिक काल एवं पौराणिक काल से अनवरत चली आ रही है। उपनिषद् एवं ब्रह्मसूत्र तथा स्कंद, वाराह, पद्म, ब्रह्माण्ड सहित सभी पुराणों में मुक्तिक्षेत्र व शालग्राम अर्चना विधि का विस्तार से वर्णन मिलता है।

श्री भगवान मुक्तिनाथ नारायण का स्वरूप आदि शालग्राम स्वरूप जो सती वृंदा के शाप के कारण भगवान विष्णु ने गण्डकी नदी में शिला रूप धारण करके मोक्ष प्राप्त किया था। अन्य शालग्राम भगवान नारायण के आज्ञा स्वरूप विश्वकर्मा ने बज्रकीट के रूप धारण करके सहस्र वर्षों तक विभिन्न रूपों एवं शालग्राम शिला निर्माण करके शालग्राम पर्वत प्रकट किए।

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ऐतिहासिक काल में आदि शालिग्राम गर्भ गृह में स्थापित करके बाहर भगवान नारायण की मूर्ति मुक्तिनाथ नारायण तथा बुद्ध भगवान लोकेश्वर जैसी भी लगती है। इसलिए यह हिंदू और बौद्ध धर्म को मानने वालों के बीच आस्था और धार्मिक सहिष्णुता का केन्द्र बना हुआ है।

इसी तरह विभिन्न पुराणों में वर्णित कथानुसार भगवान श्री बद्रीनाथ और मुक्तिनाथ के बीच में अनन्य संबंध है क्योंकि भगवान बदरीनाथ के गर्भगृह में शालग्राम भगवान की पूजा होती है। इसी तरह भगवान जगन्नाथ का भी दारु विग्रह है और उनके गर्भगृह में भी शालग्राम भगवान की पूजा होती है।

मुक्तिनाथ धाम के दामोदर कुंड जलधारा और गण्डकी नदी के संगम को काकवेणी कहते हैं। इस जगह पर तर्पण करने से 21 पीढियों का उद्धार हो जाता है।

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रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मिकी का आश्रम भी गण्डकी नदी के किनारे स्थित था। यहीं पर देवी सीता ने लव-कुश को जन्म दिया था। आज से 300 साल पहले अयोध्या में जन्मे अद्भुत बालक स्वामी नारायण ने भी मुक्तक्षेत्र और काकवेणी के मध्य एक शिला पर कठोर तप करके सिद्धि प्राप्त की थी।

श्रीमद्भागवत महापुराण आदि ग्रंथों के अनुसार कलियुग के पांच हजार वर्ष बाद गंगा आदि नदियां अपवित्र हो जाएंगी और सिर्फ पानी रह जाएगा। केवल गंडकी नदी कलियुग के दस हजार वर्ष पर्यन्त पवित्र रहेगी। अंत में, मुक्तिक्षेत्र हिंदू और बौद्ध धर्म के महान एवं पुरातन धार्मिक आस्था के केन्द्र हैं तथा मुक्तिक्षेत्र एवं भगवान मुक्तिनाथ समस्त जगत के कल्याण के लिए धरा पर अवतरित हैं।

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