उर्मिला चौधरी मानव अधिकार संबंधी अन्तर्राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित
काठमांडू, २७ मई । दाङ जिला निवासी उर्मिला चौधरी ने नेदरल्याण्ड में अन्तर्राष्ट्रीय अवार्ड प्राप्त की है । नेदरल्याण्ड की पूर्वरानी बिट्रिक्स और राजा विलियम एलेक्सन्डर ने उर्मिला को ‘लउरियट फ्रिडम फ्रम फेयर अवार्ड २०१८’ सम्मानित किए हैं । मानव अधिकार के क्षेत्र में निर्भिकता के साथ काम करनेवालों को हर दो साल में इस अवार्ड से सम्मानित किया जाता है ।

उर्मिला ने थारु समुदाय में व्याप्त कमलरी प्रथा उन्मुलन के लिए विशेष योगदान देने के कारण उनको यह सम्मान दिया गया है । उक्त पुरस्कार प्राप्त करनेवालों में से उर्मिला पहली नेपाली युवती हैं । उनकी उम्र २७ साल का है । उर्मिला का जन्म दाङ जिला गढवा गांवपालिका– ७ मानपुर में वि.सं. २०४८ साल में हुआ था । आयोजक संस्था ने अपनी वेभसाइट में लिखा है– ‘कमलरी प्रथा अन्त्य करने के लिए और उन लोगों की शैक्षिक अधिकार के लिए उर्मिला की ओर से की गई भूमिका और प्रतिबद्धता को कदर करते हुए यह अवार्ड दिया गया है ।’

इससे पहले मलाला युसफजाई, आङ साङ सुकी, हुसेन इब्राहिम सलेह अल, ग्रहेथ जोह्न इभमान जैसे व्यक्तित्व इस अवार्ड से सम्मानि हो चुके हैं । इसमें से मलाला दक्षिण एसिया की अर्थात् पाकिस्तान महिला थी । मलाला को सन् २०१४ में यह पुरस्कार दिया गया था । उसके बाद दक्षिण एसिया में ही उर्मिला (नेपाल) को यह अवार्ड प्राप्त हुआ है ।
प्राप्त अवार्ड को शर्मिला ने १३ हजारा मुक्त कमलरी को समर्पित किया है । उन्होंने कहा– ‘शुरु में अवार्ड के बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं था, नेदरल्याण्ड्स आने के बाद ही अवार्ड के बारे में पता चला है ।’ शर्मिला के अनुसार अवार्ड वितरण समारोह में नेदरल्याड्स के रोयल फेमली, प्रधानमन्त्री, मन्त्री और अन्य उच्च पदस्थ व्यक्तित्व की उपस्थिति थी । उन्होंने आगे कहा– ‘मैं यह अवार्ड मुक्त १३ हजार कमलरी को समर्पित करना चाहती हूं ।’

शर्मिला ने मुक्त कमलरी के लिए जो काम किया, उसको उच्च मूल्यांकन करते हुए मिडलवर्ग में आयोजित अवार्ड समारोह में नेदरल्याण्ड्स की पूर्व रानी बिट्रिक्स ने कहा– ‘मैं आपकी देश को उच्च सम्मान करना चाहती हूं, जिसने आप जैसे महान व्यक्ति को जन्म दिया है, जिन की आकांक्षा विश्व परिवर्तन के लिए है ।’ समारोह में राजा विलियमन ने महिलाओं की पीड़ादायी घटना पर दुःख व्यक्त करते हुए कहा– ‘विश्व में कई महिलाएं हैं, जो दुःखपूर्ण और पीडादायी घटनाओं को सामना करने के लिए बाध्य हैं । इसके बावजूद भी आप (उर्मिला) की अठोट के प्रति मैं सम्मान प्रकट करता हूं और मेरे देश में स्वागत करना चाहता हूं ।’
कार्यक्रम में उर्मिला की जीवन संबंधी वृत्तचित्र प्रदर्शन किया गया था । सम्बोधन के दौरान उर्मिला ने अपनी जीवन और अभियान के संबंध में कहा था । इससे पहले शर्मिला ने राष्ट्रसंघ युथ करेज अवार्ड फर एजुकेशन, इन्टरनेशनल ह्यमन राइट्स अवार्ड (जर्मनी) भी प्राप्त की है । उर्मिला के संबंध में दर्जन से अधिक वृत्तचित्र तैयार हुआ है । गत वर्ष निर्मित ‘उर्मिला’ नामक वृत्तचित्र ने तो गत साल किम्फ में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया था । उर्मिला की जीवनगाथा को समेट कर जर्मन भाषा में किताब भी प्रकाशित हो चुका है ।

उर्मिला ऐसी युवती है, जिनके माता–पिता अपने ही गांव के एक जमिनदार के घर में ‘कमैया’ के रुप में काम करते थे । जमिदार ने परिवार को ही बन्धक बनाया था । अर्थात् उर्मिला के परिवारिक सदस्य जिस घर में काम करते थे, उसके बदले उन लोगों परिश्रमिक वापत कुछ भी नहीं मिलता था । पिताजी को खाने के लिए जो कुछ मिलता था, उसी को बांटकर परिवार के अन्य सदस्य भी खाते थे । जब उर्मिला ६ साल की हो गई, वह भी ‘कमलरी’ के रुप में दूसरों के घर में काम करने के लिए चली गई । उस वक्त वह अपनी उम्र से ज्यादा उम्र के बच्चों को झोला और किताब बोक कर स्कुल पहुँचाती थी । इसी तरह उर्मिला ने ७ साल गुजार दिया ।
जब वि.सं. २०५७ साउन २ गते सरकार ने सभी कमलरी को ‘मुक्त’ घोषणा किया, तब से उर्मिला भी अभियान में सहभागी होने लगी, आन्दोलन में सहभागी हो गई । अभियान के दौरान ही वि.सं. २०६३ साल में उर्मिला भी ‘कमलरी’ से मुक्त हो गई । उसके बाद वह मुक्त कलमरी के अधिकार और शिक्षा के लिए लड़ने लगी । अभियान दिन प्रति दिन सफलता की ओर आगे बढ़ने लगा । उर्मिला आज स्नातक तहों में अध्ययन करती है । ‘मुक्त कमलरी विकास मंच के जरिए वह आज भी मुक्त कमलरी की मानवाअधिकार संबंधी अभियान में सक्रिय हो रही है ।

