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रोटरी समूह द्वारा वीर अस्पताल को सहयोग

 

काठमांडू । रोटरी क्लब अफ राजधानी और रोटरी क्लब अफ काठमांडू मेट्रो द्वारा वीर अस्पताल को सहयोग किया गया है । कॉलेजा की कडापन जाचनेवाला आधुनिक उपकरण ‘फाइब्रो स्क्यान’ मसिन संस्था की ओर से स्वास्थ्य राज्यमन्त्री पद्मा अर्याल को हस्तान्तरण किया गया । रोटरियन सुशील गुप्ता के अनुसार उक्त मसिन भारतीय शहर चेन्नाई से लाया गया है । हेपाटाइटिस ‘बि’ और ‘सी’ के मरीज तथा मदिरा सेवन के कारण खराब कॉलेजों को शल्यक्रिया के लिए यह मसिन प्रयोग में आता है, जो अन्य कोई भी सरकारी हस्पिटल में आज तक नहीं है । स्वास्थ्य मन्त्रालय और रोटरी क्लब की संयुक्त प्रयत्न में उक्त मसिन लाया गया है । मसिन का मूल्य २ करोड रुपयां से भी अधिक है । मसिन के लिए स्वास्थ्य मन्त्रालय ने २० लाख दिया है, बांकी रकम रोटरी क्लब ने दिया है । इसमें बरिष्ट रोटेरियन मिथिलेशकुमार झा ने प्रमुख भूमिका निभाई है | साथही वीर अस्पताल की और से लीभर विशेषज्ञ तथा लिभर विभाग के प्रमुख प्रो.डा. अनिलकुमार मिश्र ने मशीन लाने में अपनी अग्रसरता दिखाई |

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इसीतरह रोटरी की ओर से हस्पिटल को ९ थान डायलाइसिस उपकरण भी हस्तान्तरण किया गया है । किड्नी ड्यामेज होनेवाले लोगों की सहयोग के लिए यह डायलासिस मसिन हस्तान्तरण किया गया है । हस्पिटल के अनुसार ९ मसिन में से २ मसिन को आइसियु में रखा जाएगा । बांकी मसिन से नियमित डायलासिस की काम और हेपाटाइटिस बी, सी और एचआई संक्रिमितों को लिए प्रयोग किया जाएगा ।
फाइब्रो स्क्यान मसिन के प्रयोग से अब शल्यक्रिया के जरिए वायस्पी करने की आवश्यकता नहीं है । इसके साथ–साथ शल्यक्रिया और परीक्षण के लिए मरीजों को भारत जाने की बाध्यता भी अन्त्य हो गया है । कॉलेजा रोग विशेषज्ञ डा. दिलिप शर्मा के अनुसार स्वथ्य व्यक्तियों की कॉलेजा नरम होता है । अगर कुछ कारणों से कॉलेजा में समस्या आती है तो उस का कड़ापन बढ़ता जाता है । कडापन बढ़ने के कारण लिभरसिरोसिस होने की सम्भावना ज्यादा रहती है । अगर लिभरसिरोसिस हो जाता है तो उसकी उपचार सम्भव नहीं है ।
डा. शर्मा के अनुसार कॉलेजा क्यान्सर की अवस्था में पहुँच गया है या नहीं, उसको जानके लिए और हेपाइटिस बी और सी की उपचार को प्रभावकारी बनाने के लिए फाइब्रो स्क्यान मसिन अत्यावश्यक है । कॉलेजा खराब होकर जो व्यक्ति हस्पिटल पहुँचे है, उनमें से ५० प्रतिशत लोगों के पीछे मदिरा ही कारण पाया जाता है । कुछ साल पहले तक ५०–६० साल उम्र के मदिरा सेवनकर्ता को कॉलेजा की समस्या दिखाई देता था, लेकिन आज ३५–४० साल उम्र के लोगों में भी ऐसी समस्या दिखाई दिया है ।

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