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क्या मधेशीयों ने गुलामी स्वीकार कर लिया है ? : रामेश्वर प्रसाद सिंह (रमेश)

 

रामेश्वर प्रसाद सिंह (रमेश), गोलबजार-13, सिरहा (मधेश) | स्थानीय, प्रदेश सभा एवं लोक सभा के तीनों चुनाव में मधेशी जनता ने दो तरीकों से मतदान किए | चुनावी दल एवं नेपाली साम्राज्य में ही अधिकार ढुँढ़ने वालों ने दलीय छापों में मतदान किया तो दुसरी ओर नेपाली साम्राज्य से आजादी चाहने वालों ने कोठली बाहर मतदान किया |

जिन्होंने कोठली के बाहर मतदान किया उसके लिए कोई असमंजस की बात ही नहीं हैं | वे अपने लक्ष्य के प्रति साफ और अटल हैं | किन्तु जिन्होंने कोठली के अंदर मतदान किया हैं उनके लिए सोंचने की घड़ी हैं | वे जिस प्रतिनिधियों को चुनकर भेंजे वे सब के सब सत्ता एवं भत्ता में लिप्त होकर उनके आवाज को ही चुप कर दिया |

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इतना होने के वाबजुद भी मधेशी जनता शान्त हैं एवं विकल्प के प्रति अनुदार दिख रहें हैं | उन जयचंद नेताओं के खिलाफ भी केबल सोसल मिड़िया में जंग छेड़ा हुआ हैं और मधेश से सोसल मिडिया के प्रयोग कर्ता करिब एक फिसदी ही हैं | उनमें भी अधिकतम ने चुप्पी साध लिया हैं |

अन्याय एवं गलत का विरोध न करना और चुप्पी साधने का मतलब मौन समर्थन ही होता हैं | तो क्या मधेशी जनता ने भी जील्लत भरी जिन्दगी स्वीकार कर लिया हैं ? क्या वे भी गुलामी से ही खूश हैं ? क्या वे भी अपने परिवारजनों एवं रिस्तेदारों का बलिदान एवं कुर्बानी को भूला दिया हैं ? क्या वे भी शहीदों के हत्यारा के साथ हाथ मिलाने वालों का मतियार बन गया हैं ? आज उनके मन में यह सबाल आए न आए परंतु आने वाले पिढ़िया अवश्य ही यह सबाल करेंगे |

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याद रहें अगर अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ते लड़ते आप वीरगति को प्राप्त होते हैं तो आने वाले पीढ़ी उन्हें केबल याद ही नहीं रखते अपितु उनका बदला भी लेते हैं किन्तु अन्याय और अत्याचार से डरकर जींदा रहने वालों के उपर आने वाले पीढ़ी कोंसते ही हैं |

अन्याय और उतपिडन से बचाने हेतु देबलोक से कोई देबदुत नहीं आने वाला हैं | उतपिडन में पड़े लोगों को ही संघर्ष करना पड़ता हैं | अब मधेशी जनता अपने आत्मसम्मान हेतु संघर्ष करते हैं या फिर गुलामी को सिरोधार्य करते हैं यह वक्त ही बताएगा |

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रामेश्वर प्रसाद सिंह (रमेश)

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