जातिगत आरक्षण मधेश को तोड़ देगा : डि.के. सिंह
डि.के. सिंह | मधेश में यह बहस चल रही है कि आरक्षण जाति के आधार पर हो या आर्थिक आधार पर ? समय-समय पर कई तबके के लोग आरक्षण की मांग करते हैं तो वहीं कई राजनेता भी इस बारे में बयान दे चुके हैं। शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण को लेकर युवाओं के बीच भी यह मुद्दा गरमाया हुआ है। सवर्ण जातियों की मांग है कि आर्थिक आधार पर सभी जातियों को आरक्षण देना चाहिए, वहीं दलित, मुस्लिम, जनजाति के लोग जातिगत आरक्षण को सही मानते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि आरक्षण जाति के हिसाब से नही, आर्थिक हिसाब से भी नही, प्रतिभा कि हिसाब से होना चाहिए।
हाल के दिनो मे एक मानव-अधिकार के पदाधिकारी द्वारा आरक्षण जैसे शब्दों पर जाति एवं समाज की एक-जुटता को भंग करने कि कोशिश की गई। उनके अनुसार दलित को पहले दबाया गया उसी के आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए। उनके कथन से यह लगता है , की पहले स्वर्ण ने उनके समाज को दबाया था इसलिए उनको आरक्षण चाहिए। इस प्रकार की बातों से समाज मे दोषारोपण होगा और कटुता बढ़ेगी।
दलित, पिछड़ा सभी की हालत सुधारने की आवश्यकता है, इसमें संपूर्ण समाज को मिलकर काम करने की जरूरत है। सवाल उठता है कि, कोई दलित सरकारी पदाधिकारी हो तो क्या उसके बच्चे को आरक्षण का लाभ मिलना सही होगा ? कोई स्वर्ण मज़दूर है तो क्या उसके बच्चे को आरक्षण के लाभ मिलना चाहिए या नही?
जातिगत आरक्षण समाज को जाति के नाम पर तोड़ देगा, आरक्षण समाज को निकम्मा बना देगा। आरक्षण का मुद्दा भारत से लाकर मधेस को गुमराह करने की साज़िश हो रही है। भारत मे पिछले कुछ सालों से जातिगत आरक्षण जैसे शब्दों पर राज्य के विधान सभा से लेकर लोक सभा तक आरक्षण की आग लगी है। कही बंद, कही आगज़नी तो कही आत्मदाह के कारण भारत जैसे बडे राष्ट्र को नुकसान उठाना पडा है। जिस जिस देश मे जातिगत आरक्षण है वह विकसित देश नही है। जिस जिस देश मे जातिगत आरक्षण नही है, जहाँ लोगो कि प्रतिभा पर चयन किया जाता है वह देश विकसित देश है, जैसेे अमेरिका, कनाडा ऑस्ट्रेलिया। अभी तक मधेश में यादव, तेली, झा, चमार, मियां नही सिर्फ मधेशी मिलते है, लेकिन जातिगत आरक्षण के बाद सिर्फ ये जातियां मिलेंगी मधेशी नहीं। इस पर खुलकर बहस होना चाहिए कि हम सब मधेस को विकसित की श्रेणी मे ले जाए या अपाहिज की श्रेणी मे ले जाकर ढ़ोल- नगाड़े पिटते रहे।


