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डा. ज्योति मिश्रा

स्त्री ने गर्भाधान किया, नौमास उसी का ध्यान किया
भार सहा, औ अकुलाहट, नवअनुभव का ज्ञान किया

सहकर भारी प्रसववेदना, दिया जन्म नवजीवन को
मृत्युतुल्य पीड़ा के कारण, पुनर्जन्म का भान किया

खÞुद गीले बिस्तर पर सोकर, उसे सुलाया सूखे में
पकड़ के उँगली माँ की, चलना उसने मान लिया

खुद भूखे रहकर भी, उसे खिलाया स्वर्ण निवाला
अपने पेट, बांध के पट्टी उसकी भूख का भान किया

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ले गोद में उसे पढ़ाया, अपना पल–पल वारा उस पर
हाथ पकड़कर बच्चे ने हर अक्षर–अक्षर जान लिया

डाली संस्कृति उसके भीतर मानवता का दिया पाठ
वो सीखेगा, यही सिखाने, उसे बड़ों सा मान दिया

नहीं किया दंडित गलती पे, हाथ फेर सिर समझाया
उसे बनाने को, माँ ने जाने कितना विषपान किया

पहले माँ पूजी जाती थी, झुकते थे उसके चरणों में
आज माँ है वृद्धाश्रम में, क्यों न उसको मान दिया।

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बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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